दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार 23 अप्रैल को एक अहम आदेश देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को निर्देश दिया कि वे अदालत की कार्यवाही के कथित अनधिकृत वीडियो तुरंत हटाएं। यह मामला अरविन्द केजरीवाल और अन्य से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) से सामने आया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह याचिका अधिवक्ता वैभव सिंह द्वारा दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि 13 अप्रैल को हुई सुनवाई-जिसमें केजरीवाल ने न्यायाधीश के रिक्यूज़ल (स्वयं को मामले से अलग करने) की मांग की थी-को बिना अनुमति रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर साझा किया गया।
याचिका में इन वीडियो को हटाने, संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ अवमानना कार्रवाई शुरू करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी। इसमें पत्रकार रवीश कुमार का नाम भी शामिल था।
न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान मेटा प्लेटफार्म और गूगल LLC की दलीलों पर गौर किया।
मेटा ने अदालत को बताया कि उसे जो लिंक भेजे गए थे, उनमें से कुछ पहले ही हटाए जा चुके हैं। वहीं गूगल ने कहा कि कुछ यूट्यूब लिंक नहीं हटाए गए क्योंकि उनमें कथित तौर पर अदालत की कार्यवाही नहीं थी हालांकि याचिकाकर्ता ने इस दावे का विरोध किया।
अदालत ने मौखिक रूप से कहा,
“हम संस्था के बड़े हित को लेकर चिंतित हैं। अगर इस तरह की सामग्री पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।”
अदालत ने निम्न निर्देश दिए:
- गूगल को आदेश दिया गया कि वह रिकॉर्ड में बताए गए पेजों से संबंधित वीडियो हटाए और अपनी स्थिति पर हलफनामा दाखिल करे।
- X Corp (पूर्व में ट्विटर) को नोटिस जारी कर ऐसे वीडियो हटाने को कहा गया, यदि वे उसके प्लेटफॉर्म पर मौजूद हों।
- याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी गई कि वह ऐसे वीडियो के लिंक संबंधित प्लेटफॉर्म्स को साझा करे, जिसके बाद उन्हें हटाना होगा।
अदालत ने यह भी पूछा कि क्या प्लेटफॉर्म यह पहचान सकते हैं कि वीडियो सबसे पहले किसने अपलोड किया। मेटा ने बताया कि वह बेसिक सब्सक्राइबर जानकारी और IP लॉग दे सकता है, लेकिन पहले अपलोडर की पहचान करना आसान नहीं है।
सुनवाई के दौरान मेटा की ओर से वरिष्ठ वकील ने श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खुद से यह तय नहीं कर सकते कि कौन-सा कंटेंट अवैध है, जब तक उन्हें न्यायालय या सक्षम प्राधिकारी से निर्देश न मिले।
अदालत ने यह भी माना कि तकनीकी रूप से ऐसे वीडियो की पहचान करना मुश्किल हो सकता है, खासकर जब उन्हें एडिट कर दोबारा अपलोड किया जाए।
अदालत ने संबंधित वीडियो हटाने के निर्देश जारी करते हुए सभी पक्षों जिसमें केजरीवाल और अन्य शामिल हैं को नोटिस जारी किया। साथ ही, केंद्र सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से भी जवाब मांगा गया।
मामले की अगली सुनवाई 6 जुलाई को निर्धारित की गई है।
Case Title: Vaibhav Singh v. Delhi High Court & Ors.











