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सुप्रीम कोर्ट ने कहा सिविल विवाद का हवाला देकर आपराधिक जांच नहीं रोकी जा सकती, हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर जमीन धोखाधड़ी मामले में FIR और जांच को दोबारा शुरू करने का निर्देश दिया। - अक्काम्मा सैम जैकब बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य।

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा सिविल विवाद का हवाला देकर आपराधिक जांच नहीं रोकी जा सकती, हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा कि शुरुआती चरण में आपराधिक कार्यवाही को रोकना उचित नहीं था। कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें FIR और आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला बेंगलुरु के डोड्डागुब्बी गांव की जमीन से जुड़ा है, जहां कई अनिवासी भारतीय (NRI( खरीदारों ने प्लॉट खरीदे थे। शिकायतकर्ता का आरोप था कि कुछ लोगों ने फर्जी दस्तावेज़, जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) और कन्फर्मेशन डीड बनाकर उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया।

शिकायत में कहा गया कि धोखे से हस्ताक्षर लिए गए और बाद में उन्हीं दस्तावेजों का इस्तेमाल कर जमीन किसी अन्य व्यक्ति के नाम ट्रांसफर कर दी गई। पुलिस ने इन आरोपों के आधार पर कई धाराओं में FIR दर्ज की थी।

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कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 2016 में इस FIR को रद्द कर दिया था। कोर्ट का मानना था कि मामला मुख्य रूप से सिविल विवाद है और जब तक संबंधित बिक्री दस्तावेजों को सिविल कोर्ट में रद्द नहीं किया जाता, तब तक आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि जमीन की पहचान और स्वामित्व से जुड़े सवाल जटिल तथ्यात्मक मुद्दे हैं, जिनका समाधान सिविल कोर्ट में ही होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण से असहमति जताई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि मामला सिविल प्रकृति का दिखता है, आपराधिक जांच को रोका नहीं जा सकता।

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पीठ ने कहा,

“यदि शिकायत में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है, तो जांच को रोका नहीं जाना चाहिए।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकारों का उपयोग करते समय सीमाओं का उल्लंघन किया और आरोपियों के बचाव से जुड़े दस्तावेजों पर पहले ही विचार कर लिया, जो इस चरण में उचित नहीं था।

एक अन्य महत्वपूर्ण टिप्पणी में कोर्ट ने कहा,

“जांच के शुरुआती चरण में हस्तक्षेप केवल दुर्लभ परिस्थितियों में ही होना चाहिए।”

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सुप्रीम कोर्ट ने दो अहम सिद्धांतों पर जोर दिया:

पहला, सिविल और आपराधिक कार्यवाही साथ-साथ चल सकती हैं।

दूसरा, मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 156(3) CrPC के तहत जांच का आदेश देने के बाद, हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करते समय अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

कोर्ट ने माना कि इस मामले में गंभीर आरोप जैसे धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश की जांच आवश्यक थी, जिसे शुरुआती स्तर पर रोकना न्याय के हित में नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 28 सितंबर 2016 के आदेश को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने FIR और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों को पुनर्जीवित करते हुए निर्देश दिया कि जांच कानून के अनुसार आगे बढ़ाई जाए।

साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां मामले के अंतिम परिणाम को प्रभावित नहीं करेंगी।

Case Details

Case Title: Accamma Sam Jacob v. State of Karnataka & Ors.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) Diary No. 20175 of 2022 (with connected matters)

Judges: Justice Vikram Nath & Justice Sandeep Mehta

Decision Date: April 13, 2026

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