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उत्तराधिकारियों को आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को चुनौती देने के लिए अनुच्छेद 227 नहीं, बल्कि धारा 34 का सहारा लेना होगा: सर्वोच्च न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानूनी वारिस आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को केवल धारा 34 के तहत ही चुनौती दे सकते हैं, न कि सीधे संवैधानिक उपायों से। - वी.के. जॉन बनाम एस. मुकनचंद बोथरा और अन्य।

Rajan Prajapati
उत्तराधिकारियों को आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को चुनौती देने के लिए अनुच्छेद 227 नहीं, बल्कि धारा 34 का सहारा लेना होगा: सर्वोच्च न्यायालय

सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण सवाल पर स्पष्टता दी - क्या किसी मृत पक्षकार के कानूनी वारिस सीधे हाईकोर्ट में चुनौती दे सकते हैं, या उन्हें आर्बिट्रेशन कानून के तहत ही जाना होगा? अदालत ने इस पर साफ रुख अपनाया।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला वी.के. जॉन बनाम एस मुकनचंद बोथरा एवं अन्य से जुड़ा है। यह विवाद 2007 में हुए एक संपत्ति बिक्री समझौते से शुरू हुआ। समझौते के बाद संबंधित व्यक्ति की मृत्यु हो गई और 2011 में आर्बिट्रेशन शुरू हुआ।

आर्बिट्रेटर ने 21 फरवरी 2011 को अवॉर्ड पारित किया, जिसमें संपत्ति की बिक्री को लागू करने का निर्देश दिया गया। बाद में इस अवॉर्ड के निष्पादन के लिए कार्यवाही भी शुरू हुई।

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अपीलकर्ता का कहना था कि उसे इन कार्यवाहियों की जानकारी काफी देर से मिली और वह स्वयं को वास्तविक कानूनी वारिस बताता है। उसने दावा किया कि उसे सुना नहीं गया, इसलिए अवॉर्ड गलत है।

अपीलकर्ता ने मद्रास हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन याचिका दायर की। लेकिन हाईकोर्ट ने 3 फरवरी 2023 को इसे खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अपीलकर्ता खुद को कानूनी वारिस मानता है, तो उसे मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत ही उपाय अपनाना चाहिए, न कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत।

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सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह प्रमुख सवाल तय किया-
क्या कानूनी वारिस आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को चुनौती देने के लिए सीधे संवैधानिक उपाय अपना सकते हैं?

अदालत ने कहा कि आर्बिट्रेशन कानून एक “पूरा कोड” है, यानी इसमें ही सभी उपाय उपलब्ध हैं।

बेंच ने स्पष्ट किया:

“आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को चुनौती देने का उचित उपाय केवल धारा 34 के तहत ही है, न कि अनुच्छेद 227 या सीपीसी के तहत।”

अदालत ने आगे कहा कि:

“कानूनी प्रतिनिधि, मृत व्यक्ति के स्थान पर आते हैं और उन्हें वही अधिकार और दायित्व मिलते हैं जो मूल पक्षकार को प्राप्त थे।”

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इसका मतलब यह है कि अगर अवॉर्ड उनके खिलाफ लागू हो सकता है, तो उसे चुनौती देने का अधिकार भी उन्हें मिलना चाहिए।

कोर्ट ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34, 35 और 40 का हवाला देते हुए कहा कि:

  • आर्बिट्रेशन समझौता किसी पक्ष की मृत्यु से खत्म नहीं होता
  • कानूनी वारिस उस समझौते से बंधे रहते हैं
  • इसलिए उन्हें चुनौती देने का अधिकार भी होना चाहिए

अदालत ने यह भी जोड़ा कि:

“कानूनी प्रतिनिधियों को एक तरफ जिम्मेदार ठहराया जाए और दूसरी तरफ उन्हें उपाय से वंचित कर दिया जाए, यह न्यायसंगत नहीं होगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।

हालांकि, अदालत ने अपीलकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 34 के तहत उचित याचिका दायर कर सकता है। साथ ही, लिमिटेशन अवधि इस निर्णय की तारीख से शुरू होगी।

Case Details:

Case Title: V.K. John v. S. Mukanchand Bothra & Ors.

Case Number: Civil Appeal (arising out of SLP (C) No. 16162 of 2023)

Judge: Justice Sanjay Karol with Justice Vipul M. Pancholi

Decision Date: April 20, 2026

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