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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर किरायेदार को दुकान खाली करने का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने किरायेदारी विवाद में हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर ट्रायल कोर्ट का बेदखली आदेश बहाल किया, पुनरीक्षण अधिकार की सीमाएं स्पष्ट कीं। - श्री एम.वी. रामचंद्रसा (दिवंगत) के कानूनी वारिसों द्वारा प्रतिनिधित्व बनाम मेसर्स महेंद्र वॉच कंपनी और अन्य

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर किरायेदार को दुकान खाली करने का आदेश दिया

किरायेदारी और अवैध सबलेटिंग (बिना अनुमति किसी और को किराए पर देना) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि हाईकोर्ट अपनी पुनरीक्षण (revision) शक्ति का दायरा पार नहीं कर सकता। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के बेदखली आदेश को सही ठहराते हुए हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला श्री एम.वी. रामचन्द्रसा (मृतक) बनाम मेसर्स महेंद्र वॉच कंपनी से है।अपीलकर्ता, जो अब मृतक मकान मालिक के कानूनी उत्तराधिकारी हैं, ने आरोप लगाया कि किरायेदार ने बिना अनुमति दुकान को तीसरे पक्ष को सौंप दिया।

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ट्रायल कोर्ट (बेंगलुरु स्मॉल कॉज कोर्ट) ने 2017 में यह पाया कि दुकान पर वास्तविक कब्जा उन लोगों का है जो मूल किरायेदार नहीं हैं। अदालत ने इसे अवैध सबलेटिंग मानते हुए किरायेदार को तीन महीने में दुकान खाली करने का आदेश दिया।

हालांकि, 2023 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस आदेश को पलट दिया और किरायेदार के पक्ष में फैसला दिया।

सुप्रीम कोर्ट के सामने तीन मुख्य सवाल थे:

क्या हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सबूतों की दोबारा जांच की?

क्या मकान मालिक ने अवैध सबलेटिंग साबित की?

क्या साझेदारी (partnership) में बदलाव को सबलेटिंग माना जा सकता है?

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न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि:

“हाईकोर्ट की पुनरीक्षण शक्ति सीमित है। यह अपील की तरह पूरे मामले की दोबारा जांच करने का मंच नहीं है।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट ने गवाहों और दस्तावेजों के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले, वे तथ्यात्मक (facts-based) थे और उनमें कोई बड़ी गलती नहीं थी।

एक और महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा गया:

“जब तीसरे व्यक्ति का कब्जा साबित हो जाता है, तो किरायेदार पर यह जिम्मेदारी आ जाती है कि वह बताए कि यह कब्जा वैध कैसे है।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:

किरायेदार यह साबित नहीं कर पाए कि नए व्यक्ति वैध साझेदार थे।

कोई ठोस साझेदारी दस्तावेज या मकान मालिक की लिखित अनुमति प्रस्तुत नहीं की गई।

केवल किराया भुगतान या दुकान में मौजूदगी से किरायेदारी अधिकार नहीं मिल जाते।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकार का अतिक्रमण किया।

“हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन (reappreciation) किया, जो कि पुनरीक्षण अधिकार के दायरे से बाहर है।”

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अदालत के अनुसार, हाईकोर्ट ने खुद को अपीलीय अदालत की तरह व्यवहार किया, जो कानून के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट का बेदखली आदेश बहाल कर दिया।

इस प्रकार, किरायेदारों को दुकान खाली करने का निर्देश फिर से लागू हो गया।

Case Details

Case Title: Sri M.V. Ramachandrasa (Since Deceased) Represented by Legal Heirs vs M/s Mahendra Watch Company & Others

Case Number: Civil Appeal No. 4353 of 2026 (Arising out of SLP (C) No. 25957 of 2023)

Judge: Justice R. Mahadevan and Ahsanuddin Amanullah

Decision Date: APRIL 10, 2026.

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