सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के मामलों में अदालत आरोपी को सुने बिना संज्ञान नहीं ले सकती। अदालत ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 223(1) के तहत आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति नोंगमेइकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने परविंदर सिंह के खिलाफ पारित उत्तराखंड हाईकोर्ट और विशेष PMLA अदालत के आदेश रद्द कर दिए।
मामले की पृष्ठभूमि
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने जुलाई 2023 में परविंदर सिंह के खिलाफ ECIR दर्ज की थी। इसके बाद अप्रैल 2024 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। ED ने 24 जून 2024 को PMLA की धाराओं 3 और 4 के तहत विशेष अदालत में अभियोजन शिकायत दाखिल की।
उस समय मामला संज्ञान के लिए सूचीबद्ध हुआ, लेकिन अदालत ने 2 जुलाई 2024 को संज्ञान लिया। तब तक 1 जुलाई 2024 से BNSS लागू हो चुकी थी।
परविंदर सिंह ने बाद में अदालत में कहा कि संज्ञान लेने से पहले उन्हें सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया, जबकि BNSS में ऐसा करना अनिवार्य बनाया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि BNSS की धारा 223(1) आरोपी को सुनवाई का अधिकार देती है और यह प्रावधान PMLA मामलों पर भी लागू होता है।
वहीं ED की ओर से दलील दी गई कि PMLA एक विशेष कानून है और चूंकि शिकायत BNSS लागू होने से पहले दाखिल हो चुकी थी, इसलिए पुराने CrPC के प्रावधान लागू होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने ED की दलील को खारिज करते हुए कहा कि धारा 223(1) का पहला प्रावधान केवल प्रक्रिया संबंधी नहीं बल्कि आरोपी के निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार से जुड़ा हुआ है।
पीठ ने कहा,
“धारा में इस्तेमाल किया गया ‘shall’ शब्द अनिवार्य प्रकृति का है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल शिकायत दर्ज कर देना या उसे अगली तारीख पर लगाना “इंक्वायरी” शुरू होना नहीं माना जा सकता। कोर्ट के अनुसार, इंक्वायरी तभी मानी जाएगी जब अदालत न्यायिक रूप से मामले पर अपना मन लगाए।
पीठ ने अपने पहले के फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि CrPC की शिकायत संबंधी धाराएं - जो अब BNSS में शामिल हैं - PMLA मामलों पर भी लागू होंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए 19 मई 2025 के उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले और 2 जुलाई 2024 के विशेष अदालत के संज्ञान आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने विशेष अदालत को निर्देश दिया कि वह आरोपी को सुनवाई का अवसर देकर संज्ञान के चरण से दोबारा कार्यवाही करे और यह प्रक्रिया आठ सप्ताह के भीतर पूरी करे।
पीठ ने कहा कि धारा 223(1) का पालन न करना “ऐसी अवैधता है जो पूरी कार्यवाही को प्रभावित करती है।”
Case Details:
Case Title: Parvinder Singh v. Directorate of Enforcement
Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 12055 of 2025
Bench: Justice M. M. Sundresh and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh
Date: May 19, 2026











