भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा रद्द की गई जमानत को बहाल कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल नए अपराध में संलिप्तता के आधार पर जमानत रद्द करना उचित नहीं है, खासकर जब सजा की सीमा कम हो।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला नारायण बनाम मध्य प्रदेश राज्य से जुड़ा है, जिसमें अपीलकर्ता की जमानत हाई कोर्ट ने रद्द कर दी थी। यह जमानत पहले एम.पी. एक्साइज एक्ट, 1915 की धारा 34(2) के तहत दर्ज मामले में दी गई थी।
बाद में राज्य सरकार ने यह कहते हुए जमानत रद्द करने की मांग की कि आरोपी दोबारा समान अपराध में शामिल पाया गया है। इस आधार पर हाई कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को जमानत रद्द कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर शामिल थे, ने मामले की सुनवाई की।
अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 480(3) का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह प्रावधान उन मामलों में लागू होता है जहां अपराध की सजा सात साल या उससे अधिक हो सकती है।
पीठ ने कहा,
“रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि जिस नए अपराध का हवाला दिया गया है, उसकी अधिकतम सजा पांच साल से कम है, इसलिए धारा 480(3) के तहत कड़े शर्तें लागू नहीं की जा सकतीं।”
अदालत ने यह भी जोड़ा कि केवल इसी आधार पर जमानत रद्द करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करने के लिए ठोस और गंभीर कारण होना जरूरी है। केवल यह कहना कि आरोपी दोबारा अपराध में शामिल हुआ, पर्याप्त नहीं है-खासकर जब वह अपराध गंभीर श्रेणी में नहीं आता।
“ऐसी परिस्थितियों में जमानत रद्द करना उचित नहीं ठहराया जा सकता,” पीठ ने कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए अपील स्वीकार कर ली और आरोपी की जमानत बहाल कर दी।
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हालांकि, अदालत ने आरोपी को चेतावनी भी दी।
“आरोपी भविष्य में किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होगा। यदि ऐसा पाया जाता है, तो राज्य को जमानत रद्द करने का अधिकार रहेगा,” कोर्ट ने निर्देश दिया।
इसके साथ ही सभी लंबित आवेदन भी निपटा दिए गए।
Case Title: Narayan vs The State of Madhya Pradesh
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