इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी के चर्चित गंगा नदी इफ्तार पार्टी वीडियो मामले में पांच आरोपियों को जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो से धार्मिक भावनाएं प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन केवल इसी आधार पर आरोपियों को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना उचित नहीं होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला वाराणसी के थाना कोतवाली क्षेत्र से जुड़ा है, जहां आरोप था कि कुछ लोगों ने गंगा नदी में नाव पर रोजा इफ्तार पार्टी की। आरोप यह भी लगाया गया कि पार्टी के दौरान कथित रूप से मांसाहारी भोजन किया गया और उसके अवशेष नदी में फेंके गए।
पुलिस ने इस मामले में बीएनएस की कई धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया था। जांच के दौरान वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर अपलोड होने की बात भी सामने आई।
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि यह केवल एक वीडियो नहीं बल्कि “साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की बड़ी साजिश” का हिस्सा हो सकता है।
अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत में कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। उन्होंने तर्क दिया कि इस घटना से व्यापक जनभावनाएं आहत हुई हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से इसे फैलाया गया।
सरकार की ओर से विभिन्न उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि धार्मिक सद्भाव बिगाड़ने वाले मामलों में अदालतों को सख्त दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
आरोपियों की ओर से कहा गया कि उनका किसी समुदाय की भावना को ठेस पहुंचाने का इरादा नहीं था। वकीलों ने अदालत को बताया कि आरोपी गरीब बुनकर हैं और 17 मार्च 2026 से जेल में बंद हैं।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अधिकांश धाराओं में सजा सात वर्ष से कम है और आरोपियों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ल ने अपने आदेश में कहा,
“गंगा नदी का महत्व केवल हिंदू समुदाय तक सीमित नहीं बल्कि पूरे देश के लिए है।”
हालांकि कोर्ट ने यह भी माना कि जमानत पर विचार करते समय अदालत को केवल मामले के तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए।
पीठ ने कहा कि आरोपियों ने अपने हलफनामे में घटना पर “सच्चा पछतावा” जताया है। अदालत ने नोट किया कि आरोपियों ने वीडियो में अपनी मौजूदगी से इनकार नहीं किया और समाज को हुई पीड़ा पर खेद व्यक्त किया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि नाव चालक द्वारा बाद में लगाए गए जबरन कब्जे और धमकी के आरोप प्रथम दृष्टया संदेह पैदा करते हैं क्योंकि उसने शुरुआत में ऐसी कोई शिकायत नहीं की थी।
अदालत ने कहा कि जांच आगे भी जारी रह सकती है और आरोपियों को जेल में रखे बिना भी जांच प्रभावित नहीं होगी।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मोहम्मद आजाद अली, मोहम्मद तहसीम, निहाल अफरीदी, मोहम्मद तौसीफ अहमद और मोहम्मद अनस को सशर्त जमानत दे दी। अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेंगे, गवाहों पर दबाव नहीं बनाएंगे और हर सुनवाई में उपस्थित रहेंगे।











