दिल्ली हाईकोर्ट ने यूट्यूबर और अधिवक्ता गुलशन पाहुजा को आपराधिक अवमानना के दो मामलों में छह महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि पाहुजा ने न केवल न्यायपालिका के खिलाफ “स्कैंडलस” टिप्पणियां कीं, बल्कि सजा पर सुनवाई के दौरान भी अपने रवैये में कोई बदलाव नहीं दिखाया।
यह आदेश न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की खंडपीठ ने 16 मई 2026 को पारित किया। मामला अदालत द्वारा स्वतः संज्ञान लेते हुए शुरू किया गया था।
हाईकोर्ट ने 21 अप्रैल 2026 को पाहुजा को न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के तहत आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया था। इसके बाद अदालत ने उन्हें केवल सजा के मुद्दे पर सुनवाई के लिए बुलाया था।
सुनवाई के दौरान पाहुजा ने पहले के फैसले को वापस लेने की मांग की। उनका कहना था कि कार्यवाही में प्रक्रियागत अनियमितताएं हुईं और उन्हें अपना पक्ष पूरी तरह रखने का अवसर नहीं मिला।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जिन न्यायिक अधिकारियों का जिक्र उनके वीडियो में था, उन्हें अदालत के सामने पेश नहीं किया गया और न ही जिरह के लिए उपलब्ध कराया गया। साथ ही उन्होंने दावा किया कि अदालत ने उनके द्वारा दाखिल दस्तावेजों पर ठीक से विचार नहीं किया।
खंडपीठ ने आदेश में कहा कि सजा पर बहस के दौरान भी पाहुजा लगातार न्यायपालिका के खिलाफ टिप्पणी करते रहे।
अदालत के अनुसार, उन्होंने कहा:
“अदालतों की मनमर्जी बढ़ती जा रही है और मैं कोई न्याय की उम्मीद नहीं कर रहा।”
उन्होंने यह भी कहा:
“मनमर्जी का दूसरा अर्थ तानाशाही होता है।”
कोर्ट ने माना कि इन बयानों से अवमानना और गंभीर हो गई क्योंकि आरोपी ने कोई पछतावा नहीं दिखाया और न ही अपने व्यवहार में सुधार की इच्छा जताई।
पीठ ने यह भी नोट किया कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद, जिसमें उन्हें न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ वीडियो अपलोड करने से रोका गया था, पाहुजा कथित तौर पर ऐसा कंटेंट ऑनलाइन डालते रहे।
जब उन्होंने पहले के अवमानना फैसले को चुनौती देने की कोशिश की, तो अदालत ने साफ कहा:
“हम उस फैसले की समीक्षा नहीं कर सकते।”
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के तहत उनके पास उच्च अदालत में चुनौती देने का अधिकार खुला है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि इस मामले में नरमी बरती गई तो भविष्य में ऐसे कृत्यों को बढ़ावा मिल सकता है। अदालत ने माना कि मामला “अधिकतम सजा” दिए जाने योग्य है।
इसके बाद कोर्ट ने पाहुजा को दोनों अवमानना मामलों में छह-छह महीने के साधारण कारावास और प्रत्येक मामले में ₹2,000 जुर्माने की सजा सुनाई। दोनों सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
हालांकि, चूंकि पाहुजा ने सुप्रीम कोर्ट जाने की मंशा जताई, इसलिए हाईकोर्ट ने न्यायालय की अवमानना अधिनियम की धारा 19(3) के तहत उनकी सजा 60 दिनों के लिए निलंबित कर दी।
Case Title: Court on Its Own Motion v. Shiv Narayan Sharma Advocate & Ors. / Deepak Singh Advocate & Anr.
Case Number: CONT.CAS.(CRL) 3/2025 & CONT.CAS.(CRL) 4/2025











