बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शादी कोई “सर्विस कॉन्ट्रैक्ट” नहीं है और पत्नी को “घर की नौकरानी” नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि खाना ठीक से न बनाना, घरेलू कामों में कमी या शुरुआती वैवाहिक झगड़े अपने आप में ऐसी क्रूरता नहीं हैं जिनके आधार पर तलाक दिया जा सके।
डिवीजन बेंच की न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे ने फैमिली कोर्ट का तलाक संबंधी आदेश रद्द करते हुए पत्नी को हर महीने ₹20,000 देने का निर्देश भी दिया। इसमें ₹10,000 भरण-पोषण और ₹10,000 आवास खर्च शामिल है।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों की शादी फरवरी 2002 में हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। पति ने अदालत में दावा किया था कि शादी के कुछ ही दिनों बाद पत्नी का व्यवहार खराब हो गया। उसने आरोप लगाया कि पत्नी उसके माता-पिता का सम्मान नहीं करती थी, खाना ठीक से नहीं बनाती थी, घरेलू कामों में रुचि नहीं लेती थी और अक्सर झगड़ा करती थी।
पति ने इन आरोपों के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत तलाक की मांग की थी। दूसरी ओर पत्नी ने कहा कि उसे ससुराल में प्रताड़ित किया गया, जिसके कारण उसे घर छोड़ना पड़ा। उसने भरण-पोषण और रहने के लिए अलग व्यवस्था की मांग भी की।
फैमिली कोर्ट ने पहले पति के पक्ष में फैसला देते हुए तलाक मंजूर कर लिया था और पत्नी की मेंटेनेंस याचिका खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और गवाहों के बयान देखने के बाद कहा कि दोनों केवल लगभग तीन महीने साथ रहे थे और इस छोटी अवधि के दौरान होने वाले सामान्य वैवाहिक मतभेदों को “क्रूरता” नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा,
“शादी के शुरुआती दिनों में समायोजन के दौरान इस तरह के मतभेद सामान्य होते हैं। इन्हें अत्यधिक महत्व देकर क्रूरता नहीं माना जा सकता।”
बेंच ने आगे कहा कि तलाक के लिए क्रूरता इतनी गंभीर होनी चाहिए कि पति या पत्नी के लिए साथ रहना असंभव हो जाए।
एक अहम टिप्पणी में अदालत ने कहा,
“शादी बराबरी की साझेदारी है, कोई सेवा अनुबंध नहीं और पत्नी को ‘डिम्ड मेड’ नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी पाया कि पति ने अपने आरोप साबित करने के लिए मुख्य रूप से अपनी मां और मौसी के बयान पर भरोसा किया था, जिन्हें अदालत ने “इंट्रेस्टेड विटनेस” माना।
मेंटेनेंस के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि केवल आर्ट और क्राफ्ट क्लास चलाने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि पत्नी के पास स्थायी आय का स्रोत है।
अदालत ने यह भी माना कि पति एक योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट है और उसमें कमाने की पर्याप्त क्षमता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राजनेश बनाम नेहा फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मेंटेनेंस मामलों में आय संबंधी दस्तावेजों की सावधानी से जांच की जानी चाहिए।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने दोनों अपीलें मंजूर करते हुए फैमिली कोर्ट का 23 जुलाई 2010 का फैसला रद्द कर दिया। पति की तलाक याचिका खारिज कर दी गई, जबकि पत्नी की भरण-पोषण याचिका स्वीकार कर ली गई।
अदालत ने पति को आदेश दिया कि वह पत्नी को ₹10,000 प्रति माह भरण-पोषण और ₹10,000 प्रति माह आवास खर्च के रूप में दे।
यह राशि आवेदन की तारीख से देय होगी।
Case Details
Case Title: K B C v. B S C
Case Number: Family Court Appeal No.159 of 2010 with Family Court Appeal No.161 of 2010
Judges: Justice Bharati Dangre and Justice Manjusha Deshpande
Decision Date: May 8, 2026











