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गुजरात हाईकोर्ट ने रिलायंस के खिलाफ ₹146.79 लाख का पानी बिल रद्द किया, कहा- पुराने हिसाब पर दोबारा वसूली अनुचित

गुजरात हाईकोर्ट ने रिलायंस के खिलाफ ₹146.79 लाख की पानी शुल्क मांग रद्द करते हुए कहा कि पुराने भुगतान के बाद दोबारा वसूली उचित नहीं है। - रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड और अन्य बनाम गुजरात राज्य और अन्य।

Shivam Y.
गुजरात हाईकोर्ट ने रिलायंस के खिलाफ ₹146.79 लाख का पानी बिल रद्द किया, कहा- पुराने हिसाब पर दोबारा वसूली अनुचित

गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड को राहत देते हुए राज्य सरकार द्वारा जारी ₹146.79 लाख के पानी शुल्क की मांग को रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि पहले से तय और चुकाए गए भुगतान के बाद दोबारा वसूली करना उचित नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद पानी के उपयोग और उसके शुल्क से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कंपनी ने राज्य सरकार के साथ समझौते के तहत पानी लिया था और समय-समय पर तय दरों के अनुसार भुगतान भी किया।

रिकॉर्ड के अनुसार, कंपनी ने 1997 से 2005 के बीच के बकाया के रूप में करीब ₹1065.10 लाख का भुगतान कर दिया था और इसके बाद “नो ड्यू सर्टिफिकेट” भी प्राप्त किया।

हालांकि, बाद में राज्य सरकार ने 21 जुलाई 2005 को एक नया नोटिस जारी कर ₹146.79 लाख की अतिरिक्त मांग की, जो कथित रूप से पुराने बिलों के पुनर्मूल्यांकन (reassessment) पर आधारित थी।

कंपनी की ओर से कहा गया कि:

  • सभी भुगतान पहले ही तय दरों के अनुसार किए जा चुके हैं
  • सरकार द्वारा बाद में पुराने समय के लिए नई गणना करना अनुचित है
  • पानी का एक हिस्सा सामाजिक जिम्मेदारी के तहत गांवों को मुफ्त दिया गया था

वकील ने अदालत में कहा,

“एक बार जब बिल जारी कर वसूली कर ली गई, तो उसी अवधि के लिए दोबारा मांग नहीं की जा सकती।”

राज्य सरकार ने तर्क दिया कि:

  • पहले की बिलिंग में त्रुटि रह गई थी
  • सरकारी प्रस्तावों (Government Resolutions) के अनुसार सही दर से वसूली की जा रही है
  • यह मांग नियमों के अनुरूप है

सरकार ने यह भी कहा कि गलती का पता चलते ही संशोधित मांग जारी की गई।

न्यायमूर्ति हेमंत एम. प्राच्छक ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह मामला एक ऐसे लेन-देन से जुड़ा है जो पहले ही पूरा हो चुका था।

अदालत ने स्पष्ट किया,

“जब अनुबंध के तहत भुगतान हो चुका हो और पक्षकार उस आधार पर आगे बढ़ चुके हों, तो बाद में उसी अवधि के लिए अतिरिक्त वसूली करना उचित नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी माना कि यदि कंपनी को पहले से पता होता कि अतिरिक्त राशि मांगी जाएगी, तो वह अपने व्यवहार और व्यावसायिक निर्णय अलग तरीके से ले सकती थी।

अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए 21 जुलाई 2005 का मांग नोटिस और उससे जुड़े सभी बिलों को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार द्वारा की गई यह अतिरिक्त मांग न्यायसंगत नहीं है और इसे निरस्त किया जाता है।

Case Details:

Case Title: Reliance Industries Ltd & Anr. vs State of Gujarat & Anr.

Case Number: Special Civil Application No. 5789 of 2006

Judge: Justice Hemant M. Prachchhak

Decision Date: 15 April 2026

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