चंडीगढ़ में सुनवाई के दौरान पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि कार्यस्थल पर एक बार कहे गए अपशब्द को अपने आप में “यौन उत्पीड़न” नहीं माना जा सकता, जब तक उसमें स्पष्ट यौन आशय न हो। अदालत ने इसी आधार पर 2019 में दर्ज FIR को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक कंपनी के निदेशक और उनकी कर्मचारी के बीच विवाद से जुड़ा था। रिकॉर्ड के अनुसार, कर्मचारी को अक्टूबर 2018 में एक कंपनी इवेंट में शामिल होना था, लेकिन उसने मेडिकल कारणों से छुट्टी मांगी। इसके बाद दोनों के बीच ईमेल पर बातचीत हुई, जिसमें कथित तौर पर अपशब्दों का इस्तेमाल हुआ।
कर्मचारी ने उसी दिन इस्तीफा दे दिया, जिसे कंपनी ने स्वीकार कर लिया। बाद में वेतन और अन्य मुद्दों को लेकर दोनों पक्षों के बीच कानूनी नोटिस का आदान-प्रदान हुआ। लगभग चार महीने बाद, फरवरी 2019 में यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई गई।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील ने अदालत को बताया कि FIR एक दबाव बनाने का तरीका है। उनका कहना था कि पूरे विवाद की जड़ नौकरी से जुड़ा मतभेद था और ईमेल में इस्तेमाल शब्द, भले ही अनुचित हों, लेकिन उनमें कोई यौन संकेत नहीं था।
उन्होंने तर्क दिया कि
“एक अकेले अपशब्द को यौन उत्पीड़न नहीं माना जा सकता, खासकर जब उसमें कोई शारीरिक संपर्क, यौन प्रस्ताव या ऐसा कोई व्यवहार नहीं हो।”
राज्य और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि आरोपी ने अपने पद का दुरुपयोग किया और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे “यौन रूप से रंगी हुई टिप्पणी” माना जाना चाहिए। उनका कहना था कि मामले की जांच और ट्रायल में ही सच्चाई सामने आएगी।
न्यायमूर्ति किर्ति सिंह ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि धारा 354-A IPC के तहत अपराध तभी बनता है जब आरोपों में यौन प्रकृति का तत्व स्पष्ट रूप से मौजूद हो।
अदालत ने कहा,
“रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह स्पष्ट है कि विवाद कार्यस्थल से जुड़ा था। इस्तेमाल किया गया शब्द भले ही असभ्य हो, लेकिन इसमें यौन आशय या संकेत नहीं है।”
अदालत ने यह भी जोड़ा कि
“एक बार कही गई अपमानजनक बात, बिना किसी पैटर्न या यौन इरादे के, आपराधिक दायित्व के स्तर तक नहीं पहुंचती।”
हाईकोर्ट ने पाया कि FIR में लगाए गए आरोप, भले ही उन्हें पूरी तरह सही मान लिया जाए, तब भी वे धारा 354-A IPC के आवश्यक तत्वों को पूरा नहीं करते।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में ट्रायल जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
इसी आधार पर कोर्ट ने FIR संख्या 35 दिनांक 10 मार्च 2019 तथा उससे संबंधित सभी कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। हालांकि, याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर ₹20,000 की राशि PGIMER, चंडीगढ़ के ‘पुअर पेशेंट वेलफेयर फंड’ में जमा कराने का निर्देश दिया गया।
Case Details
Case Title: Abhikshek Shah vs State of Haryana & Anr.
Case Number: CRM-M-36953-2019 (O&M)
Judge: Justice Kirti Singh
Decision Date: 18 April 2026










