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रिश्वत की मांग करना और उसे स्वीकार करना मात्र भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में आता है, फिर चाहे अधिकारी का पद कुछ भी हो: राजस्थान उच्च न्यायालय

राजस्थान हाईकोर्ट ने रिश्वत मामले में एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं और जांच जारी रहनी चाहिए। - जगदीश सिंह बनाम राजस्थान राज्य और अन्य।

Shivam Y.
रिश्वत की मांग करना और उसे स्वीकार करना मात्र भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के दायरे में आता है, फिर चाहे अधिकारी का पद कुछ भी हो: राजस्थान उच्च न्यायालय

राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़े मामले में एफआईआर रद्द करने की मांग ठुकरा दी। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया (prima facie) पर्याप्त सामग्री मौजूद है, जिससे जांच जारी रहनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

सवाई माधोपुर में तैनात हेड कांस्टेबल जगदीश सिंह ने भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो द्वारा दर्ज एफआईआर संख्या 334/2022 को रद्द करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 2018 और आपराधिक साजिश के प्रावधानों के तहत आरोप लगाए गए थे।

एफआईआर के अनुसार, आरोपी पर आरोप था कि उसने शिकायतकर्ता की मदद करने के बदले ₹20,000 की रिश्वत मांगी। बाद में एक मध्यस्थ के जरिए ₹10,000 की रकम ली गई। ट्रैप के दौरान मध्यस्थ को रंगे हाथ पकड़ा गया और इसके बाद आरोपी से भी वही रकम बरामद होने का दावा किया गया।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि उसके पास कोई लंबित कार्य नहीं था और उससे कोई रकम बरामद नहीं हुई। साथ ही, उसने फोन रिकॉर्डिंग पर भी सवाल उठाया।

न्यायमूर्ति प्रमिल कुमार माथुर ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि एफआईआर में रिश्वत मांगने और लेने के स्पष्ट आरोप मौजूद हैं।

अदालत ने कहा,

“रिकॉर्ड से prima facie यह स्पष्ट होता है कि अवैध धन की मांग और स्वीकार करने से संबंधित पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ट्रैप कार्यवाही, बरामदगी और फिनॉल्फ्थेलीन टेस्ट पॉजिटिव पाए गए, जो आरोपी और मध्यस्थ के बीच संबंध को दर्शाते हैं।

साथ ही अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एफआईआर को रद्द करने की शक्ति बहुत सीमित परिस्थितियों में ही इस्तेमाल की जानी चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्तर पर केवल यह देखना होता है कि क्या प्रथम दृष्टया अपराध बनता है, न कि साक्ष्यों की गहराई से जांच।

अदालत ने कहा कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी रिश्वत मांगता है, तो यह जरूरी नहीं कि वही कार्य उसके अधिकार क्षेत्र में हो। केवल रिश्वत की मांग ही अपराध के लिए पर्याप्त हो सकती है।

इसके अलावा, अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी के बचाव के तर्क ट्रायल के दौरान ही परखे जाएंगे, न कि इस प्रारंभिक चरण में।

अदालत ने पाया कि मामले में जांच रोकने के लिए कोई असाधारण परिस्थिति नहीं है।

अंततः कोर्ट ने कहा,

“इस न्यायालय को धारा 528 BNSS के अंतर्गत हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं मिलता।”

इसी के साथ, याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया गया।

Case Details

Case Title: Jagdish Singh v. State of Rajasthan & Anr.

Case Number: S.B. Criminal Misc. Petition No. 1247/2025

Judge: Justice Pramil Kumar Mathur

Decision Date: 27 January 2026

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