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निजी भूमि पर सामूहिक नमाज़ का अधिकार सीमित: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निजी भूमि पर नियमित सामूहिक नमाज़ की अनुमति मांगने वाली याचिका खारिज करते हुए कहा कि धार्मिक अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन हैं। - असीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

Rajan Prajapati
निजी भूमि पर सामूहिक नमाज़ का अधिकार सीमित: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निजी भूमि पर नियमित सामूहिक नमाज़ की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि निजी संपत्ति का उपयोग भी अनियंत्रित धार्मिक सभा के लिए नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला आसियान बनाम राज्य उत्तर प्रदेश एवं अन्य (रिट-सी संख्या 10803 ऑफ 2026) से शुरू हुआ है। ग्रोथ ने कोर्ट से मांग की थी कि उसे संभल जिले के अपने निजी निजी जमीन पर नमाज पढ़ने के लिए सुरक्षा और लाइसेंस दिया जाए।

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याचिकाकर्ता का दावा था कि वह जमीन उसके नाम गिफ्ट डीड (16 जून 2023) के आधार पर है और वहां नमाज़ पढ़ने से रोकना उसके मौलिक अधिकारों-विशेषकर अनुच्छेद 25 से 28-का उल्लंघन है।

वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि संबंधित जमीन राजस्व अभिलेखों में सार्वजनिक उपयोग (आबादी भूमि) के रूप में दर्ज है और याचिकाकर्ता का उस पर कोई वैध स्वामित्व नहीं है।

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद और न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि:

“संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक भूमि पर किसी भी व्यक्ति या समूह का स्थायी धार्मिक उपयोग का दावा मान्य नहीं हो सकता।

निजी संपत्ति के संदर्भ में कोर्ट ने महत्वपूर्ण सीमा तय करते हुए कहा:

“निजी परिसर में व्यक्तिगत और सीमित धार्मिक गतिविधियां संरक्षित हैं, लेकिन उसे बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धार्मिक स्थल में बदलने का अधिकार नहीं दिया जा सकता।”

अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी निजी स्थान पर नियमित और बड़े स्तर पर धार्मिक आयोजन होने लगते हैं, जिससे यातायात, शांति या सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है, तो राज्य को उसे नियंत्रित करने का अधिकार है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए बताया कि नमाज़ कहीं भी पढ़ी जा सकती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी खास स्थान पर इसका अधिकार स्वतः बन जाता है।

साथ ही, अदालत ने यह भी माना कि प्रशासन को किसी संभावित विवाद या अव्यवस्था का इंतजार करने की जरूरत नहीं है-यदि स्थिति से सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका हो, तो पहले ही कदम उठाए जा सकते हैं।

अदालत ने पाया कि:

  • याचिकाकर्ता के पास जमीन के स्वामित्व का स्पष्ट प्रमाण नहीं है
  • गिफ्ट डीड में जमीन की पहचान से जुड़ी जरूरी जानकारी (खाता/गाटा नंबर) नहीं है
  • रिकॉर्ड से पता चलता है कि पहले वहां केवल ईद के मौके पर ही नमाज़ होती थी
  • अब याचिकाकर्ता नियमित और बड़े स्तर पर नमाज़ आयोजित करना चाहता है

कोर्ट ने कहा कि यह “मौजूदा परंपरा का संरक्षण नहीं, बल्कि नई प्रथा शुरू करने का प्रयास” है।

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इन सभी तथ्यों और कानूनी स्थिति को देखते हुए अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता कोई ठोस कानूनी अधिकार साबित नहीं कर पाया है।

अतः, याचिका खारिज कर दी गई।

“याचिका में कोई प्रवर्तनीय अधिकार नहीं बनता, इसलिए इसे खारिज किया जाता है।”

Case Details

Case Title: Aseen vs State of U.P. and Others

Case Number: Writ - C No. 10803 of 2026

Judges: Justice Saral Srivastava and Justice Garima Prashad

Decision Date: April 6, 2026

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