बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि जब किरायेदार संपत्ति का आंशिक मालिक बन जाता है, तो उसके खिलाफ बेदखली (eviction) की कार्यवाही जारी नहीं रह सकती। यह मामला लंबे समय से चल रहे मकान-मालिक और किरायेदार विवाद से जुड़ा था।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले में मूल वादी (मकान-मालिक) ने किरायेदार के खिलाफ कई आधारों पर बेदखली का दावा किया था जैसे अनधिकृत निर्माण, सबलेटिंग, उपयोग में बदलाव, वास्तविक आवश्यकता और किराया बकाया।
ट्रायल कोर्ट ने 2009 में यह दावा खारिज कर दिया था। लेकिन अपीलीय अदालत ने 2014 में फैसला पलटते हुए मकान-मालिक के पक्ष में निर्णय दिया। इसके खिलाफ किरायेदार ने हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन आवेदन दायर किया।
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सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया किरायेदार ने 2016 में संपत्ति का 50% हिस्सा खरीद लिया था, जिससे वह आंशिक मालिक (co-owner) बन गया।
न्यायमूर्ति राजेश एस. पाटिल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि:
“जब किरायेदार सह-मालिक बन जाता है, तो उसके खिलाफ बेदखली की कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।”
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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी सह-मालिक को बेदखली कार्यवाही पर आपत्ति हो, तो ऐसी कार्यवाही समाप्त हो सकती है।
कोर्ट ने कहा,
“किरायेदार का दर्जा आंशिक मालिक बनने के बाद बदल जाता है, और ऐसे में उसे बेदखल करना कानूनी रूप से उचित नहीं है।”
अदालत ने तीन स्थितियों पर विस्तार से विचार किया:
- यदि सह-मालिक बेदखली जारी रखने के खिलाफ हो
- यदि सह-मालिक अपना हिस्सा किसी तीसरे पक्ष को बेच दे
- या यदि किरायेदार खुद संपत्ति का हिस्सा खरीद ले
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इन सभी स्थितियों में, कोर्ट के अनुसार, बेदखली कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकती।
अदालत ने सिविल रिवीजन आवेदन को स्वीकार करते हुए अपीलीय अदालत का फैसला रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट का आदेश बहाल कर दिया।
साथ ही, कोर्ट ने निर्देश दिया कि किरायेदार द्वारा अदालत में जमा की गई राशि ब्याज सहित वापस की जाए।









