राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी कर लेने वाला पति अपनी ही गलती का लाभ लेकर तलाक नहीं मांग सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्थान के कुछ हिस्सों में प्रचलित ‘नाता’ प्रथा, हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों को दरकिनार नहीं कर सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला पति लक्ष्मीलाल द्वारा दायर तलाक याचिका से जुड़ा था। पति ने दावा किया कि पत्नी पार्वती पिछले 27 वर्षों से उससे अलग रह रही है और उसने झूठे आपराधिक मामले दर्ज कर मानसिक क्रूरता की।
रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों की शादी 5 मई 1992 को हुई थी और उनसे दो बेटे हैं। बाद में पत्नी सरकारी शिक्षक के रूप में दूसरी जगह पदस्थापित हो गई। पति ने यह भी स्वीकार किया कि उसने 1997 में कृष्णा नामक महिला के साथ “नाता विवाह” कर लिया था और उससे उसके बच्चे भी हैं।
फैमिली कोर्ट ने 2023 में पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में अपील दायर की।
अदालत की टिप्पणी
डिवीजन बेंच में शामिल न्यायमूर्ति अरुण मोंगा और न्यायमूर्ति संदीप शाह ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।
अदालत ने कहा, “तलाक कोई अधिकार नहीं बल्कि एक न्यायसंगत राहत है, जिसे वही व्यक्ति मांग सकता है जो अदालत के समक्ष साफ हाथों से आए।”
बेंच ने पति के आचरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसने वैध विवाह के रहते दूसरी शादी की, पत्नी को छोड़ दिया और फिर उसी स्थिति का उपयोग तलाक पाने के लिए किया। अदालत ने कहा कि ऐसा व्यक्ति “अपनी गलती का लाभ” नहीं ले सकता।
‘नाता’ प्रथा पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
फैसले में अदालत ने राजस्थान में प्रचलित ‘नाता’ प्रथा पर भी विस्तार से टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी भी प्रथा या रिवाज को संसद द्वारा बनाए गए कानून से ऊपर नहीं रखा जा सकता।
बेंच ने कहा,
“नाता पहली शादी को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे दरकिनार करता है। इसलिए इसे हिंदू विवाह अधिनियम के तहत दूसरी शादी का वैध बचाव नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी प्रथाएं महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित करती हैं क्योंकि पहली पत्नी कानूनी रूप से विवाह में बंधी रहती है जबकि दूसरी महिला को वैवाहिक अधिकारों की कानूनी सुरक्षा नहीं मिलती।
हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी का अलग रहना “परित्याग” नहीं कहा जा सकता क्योंकि पति की दूसरी शादी उसके अलग रहने का उचित कारण थी।
कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा पुलिस शिकायतें दर्ज कराना भी स्वतः मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब पति स्वयं दूसरी शादी कर दूसरी महिला के साथ रह रहा हो।
फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि पति न तो क्रूरता साबित कर पाया और न ही बिना उचित कारण के परित्याग। अदालत ने फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पति की अपील खारिज कर दी।
Case Details
Case Title: Laxmilal v. Parwati
Case Number: D.B. Civil Miscellaneous Appeal No. 1211/2023
Judges: Justice Arun Monga and Justice Sandeep Shah
Decision Date: 12 May 2026











