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मेडिकल कॉलेज घोषणा विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने पटना के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ को दी राहत, 3 महीने की सजा को चेतावनी में बदला

सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. निगम प्रकाश नारायण पर लगी तीन महीने की सजा को घटाकर चेतावनी में बदल दिया और प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन को महत्वपूर्ण माना। - डॉ. निगम प्रकाश नारायण बनाम राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और अन्य।

Rajan Prajapati
मेडिकल कॉलेज घोषणा विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने पटना के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ को दी राहत, 3 महीने की सजा को चेतावनी में बदला

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. निगम प्रकाश नारायण को बड़ी राहत देते हुए नेशनल मेडिकल कमीशन (पूर्व में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) द्वारा लगाया गया तीन महीने का निलंबन घटाकर केवल चेतावनी/निंदा (censure) में बदल दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

डॉ. निगम प्रकाश नारायण पटना मेडिकल कॉलेज में बाल रोग विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रह चुके हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने जनवरी 2015 में देहरादून स्थित श्रीदेव सुमन सुभारती मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में कार्यभार संभाला था। बाद में अप्रैल 2015 में उन्होंने वहां से इस्तीफा देकर पटना मेडिकल कॉलेज में संविदा पर दोबारा जॉइन किया।

विवाद तब शुरू हुआ जब मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने दोनों मेडिकल कॉलेजों का निरीक्षण किया। आरोप था कि डॉ. नारायण ने पटना मेडिकल कॉलेज के निरीक्षण के लिए दिए गए घोषणा पत्र (Declaration Form) में यह जानकारी नहीं दी कि वह उसी शैक्षणिक वर्ष में देहरादून मेडिकल कॉलेज के निरीक्षण में भी फैकल्टी सदस्य के रूप में उपस्थित हुए थे।

इसके आधार पर एमसीआई की एथिक्स कमेटी ने जुलाई 2016 में उनका नाम तीन महीने के लिए इंडियन मेडिकल रजिस्टर से हटाने का आदेश दिया था।

पटना हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने पहले इस सजा को रद्द कर दिया था। अदालत ने माना था कि डॉ. नारायण ने देहरादून मेडिकल कॉलेज से इस्तीफा देने के बाद ही पटना मेडिकल कॉलेज में नियुक्ति स्वीकार की थी और उनके खिलाफ किसी गलत मंशा का स्पष्ट प्रमाण नहीं था।

हालांकि बाद में डिवीजन बेंच ने इस फैसले को पलटते हुए एथिक्स कमेटी की सजा बहाल कर दी। अदालत ने कहा कि घोषणा पत्र में पहले मेडिकल कॉलेज में उपस्थिति की जानकारी छिपाई गई थी।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि मूल कारण बताओ नोटिस में डॉ. नारायण पर दो मेडिकल कॉलेजों के निरीक्षण में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। लेकिन बाद में उन्हें एक अलग आधार - घोषणा पत्र में जानकारी छिपाने - पर दंडित किया गया, जबकि इसके लिए नया नोटिस जारी नहीं किया गया और न ही उन्हें जवाब देने का अवसर दिया गया।

पीठ ने कहा,

“बिना नया कारण बताओ नोटिस दिए और उचित सुनवाई का अवसर दिए दंड नहीं दिया जा सकता था।”

अदालत ने माना कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन था।

हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि डॉ. नारायण घोषणा पत्र में हुई गलत जानकारी को संतोषजनक तरीके से स्पष्ट नहीं कर सके। अदालत के अनुसार, इस प्रकार की गलत घोषणा को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने यह ध्यान में रखा कि 2016 के आदेश को लगभग दस वर्ष बीत चुके हैं और डॉ. नारायण अब 76 वर्ष के हैं। ऐसे में अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए “पूर्ण न्याय” करने की बात कही।

कोर्ट ने नेशनल मेडिकल कमीशन से कहा कि तीन महीने के निलंबन की सजा को घटाकर केवल चेतावनी/निंदा में बदल दिया जाए। इसी के साथ सिविल अपील का निस्तारण कर दिया गया।

Case Details

Case Title: Dr. Nigam Prakash Narain v. National Medical Commission & Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (C) No. 22707 of 2023

Judge: Justice Dipankar Datta and Justice Satish Chandra Sharma

Decision Date: May 6, 2026

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