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उत्पीड़न के मात्र आरोप दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति को बरी किया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने 1994 के आत्महत्या मामले में पति की सजा रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आत्महत्या के लिए उकसावे और क्रूरता के आरोप साबित नहीं कर सका। - बिकाश चंद्र पॉल बनाम पश्चिम बंगाल राज्य

Shivam Y.
उत्पीड़न के मात्र आरोप दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं: कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति को बरी किया

कलकत्ता हाईकोर्ट ने करीब 32 साल पुराने एक आपराधिक मामले में पति को बड़ी राहत देते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि महिला को आत्महत्या के लिए उकसाया गया था या उसके साथ ऐसी क्रूरता हुई थी जो भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और 306 के तहत अपराध बनती हो।

केस की पृष्ठभूमि

मामला वर्ष 1994 का है। मृतका के भाई ने आरोप लगाया था कि उसकी बहन स्वर्णा पाल को उसके पति बिकाश चंद्र पाल और पति की बहन द्वारा मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था। शिकायत में यह भी कहा गया था कि घटना वाले दिन महिला के साथ मारपीट हुई और बाद में उसे फांसी पर लटका पाया गया।

ट्रायल कोर्ट ने पति को धारा 498A और 306 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

न्यायमूर्ति चैताली चटर्जी दास ने रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों के बयान, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में केवल फांसी के निशान का उल्लेख था और किसी अन्य बाहरी चोट का जिक्र नहीं था।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने ऐसा कोई “प्रत्यक्ष कृत्य” या उकसावा दिया था जिससे महिला आत्महत्या के लिए मजबूर हुई हो।

अदालत ने फैसले में कहा,

धारा 306 IPC को लागू करने के लिए धारा 107 IPC के आवश्यक तत्वों का साबित होना जरूरी है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।”

मामले में मृतका की बेटी का बयान अदालत के लिए महत्वपूर्ण रहा। बेटी ने अदालत में कहा कि उसके माता-पिता के संबंध सामान्य थे और उसकी मां अवसाद में थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके मामा द्वारा उसे पहले बयान देने के लिए प्रभावित किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन के कई गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते और कथित प्रताड़ना के संबंध में कोई स्पष्ट तारीख, घटना या स्वतंत्र गवाह सामने नहीं आया।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि परिवार के सदस्यों ने पहले कभी पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि केवल सामान्य आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को धारा 498A और 306 IPC के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने कहा,

“अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा है।”

इसके साथ ही अदालत ने ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि आदेश रद्द करते हुए बिकाश चंद्र पाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

Case Details

Case Title: Bikash Chandra Paul vs The State of West Bengal

Case Number: CRA 445 of 2009

Judge: Justice Chaitali Chatterjee Das

Decision Date: May 5, 2026

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