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सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के भूस्वामियों के वन भूमि पर दावे को खारिज करते हुए कहा कि केवल राजस्व प्रविष्टियों से स्वामित्व साबित नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना की 600 एकड़ भूमि पर निजी स्वामित्व का दावा खारिज करते हुए कहा कि केवल राजस्व रिकॉर्ड से टाइटल साबित नहीं होता। - वडियाला प्रभाकर राव और अन्य। आंध्र प्रदेश सरकार और अन्य।

Rajan Prajapati
सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के भूस्वामियों के वन भूमि पर दावे को खारिज करते हुए कहा कि केवल राजस्व प्रविष्टियों से स्वामित्व साबित नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडेम जिले की लगभग 600 एकड़ जमीन पर निजी स्वामित्व के दावे को खारिज करते हुए कहा कि केवल राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर भूमि का मालिकाना हक साबित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर रिट याचिका में हाईकोर्ट सीधे टाइटल घोषित नहीं कर सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला सर्वे नंबर 81, कलवलानगरम गांव की जमीन से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि निजाम शासन के दौरान 1931-32 में उनके पूर्वजों को इस भूमि के पट्टे दिए गए थे। बाद में 1950 में सरकार ने इस क्षेत्र की 787 एकड़ भूमि को आरक्षित वन घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उनकी 600 एकड़ जमीन को प्रस्तावित रिजर्व फॉरेस्ट से बाहर रखा जाना चाहिए। इसके समर्थन में उन्होंने पहीनी, फैसल पट्टी, वसूली रिकॉर्ड और अन्य राजस्व दस्तावेज पेश किए।

हालांकि, 2003 में संयुक्त कलेक्टर ने उनका दावा खारिज कर दिया था। अधिकारी ने कहा था कि मूल पट्टा दस्तावेज पेश नहीं किए गए और केवल राजस्व प्रविष्टियां मालिकाना हक साबित नहीं करतीं।

इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां एकल पीठ ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला देते हुए वन आरक्षण की कार्यवाही को अवैध बताया था। बाद में डिवीजन बेंच ने उस आदेश को पलट दिया। इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड का मुख्य उद्देश्य केवल राजस्व वसूली होता है, न कि स्वामित्व तय करना।

पीठ ने कहा,

“राजस्व अभिलेख स्वामित्व का दस्तावेज नहीं है और इससे किसी प्रकार का स्वामित्व प्राप्त नहीं होता है।”

अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता मूल पट्टा या ऐसा कोई प्राथमिक दस्तावेज पेश नहीं कर सके जिससे उनके स्वामित्व का आधार साबित हो सके। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में संबंधित भूमि कई जगह “जंगल” के रूप में दर्ज थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट की एकल पीठ ने न्यायिक समीक्षा के दायरे से आगे जाकर भूमि पर टाइटल घोषित कर दिया था, जबकि रिट क्षेत्राधिकार में ऐसा नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा कि गंभीर तथ्यात्मक विवाद और भूमि स्वामित्व से जुड़े प्रश्नों का फैसला नियमित सिविल मुकदमे में होना चाहिए, न कि रिट कार्यवाही में।

सुप्रीम कोर्ट ने डिवीजन बेंच के फैसले को सही ठहराते हुए सिविल अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने दावे को पर्याप्त दस्तावेजों से साबित करने में विफल रहे हैं और केवल राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर मालिकाना हक स्वीकार नहीं किया जा सकता।

Case Details

Case Title: Vadiyala Prabhakar Rao & Ors. v. The Government of Andhra Pradesh & Ors.

Case Number: Civil Appeal arising out of SLP (Civil) No. 27590 of 2025

Judges: Justice Pankaj Mithal and Justice S. V. N. Bhatti

Decision Date: May 6, 2026

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