कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक अहम पारिवारिक विवाद मामले में कहा है कि किसी नाबालिग बच्चे की मां को पूरी तरह उससे दूर रखना केवल असाधारण परिस्थितियों में ही संभव है। अदालत ने माना कि अंतरिम आदेश के जरिए मां की पहुंच पूरी तरह रोकना बच्चे और मां दोनों के हितों के खिलाफ हो सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक नाबालिग बच्ची की अभिरक्षा (custody) और संरक्षक नियुक्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता श्रुति सूद उर्फ श्रुति बनर्जी ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी सास और ननद को राहत देते हुए मां की बच्ची तक पहुंच पर रोक जारी रखी गई थी।
रिकॉर्ड के अनुसार, श्रुति बनर्जी के पति अमित बनर्जी का जनवरी 2025 में निधन हो गया था। इसके बाद परिवार के भीतर संपत्ति और बच्ची की देखभाल को लेकर विवाद शुरू हुआ। दादी और बुआ ने गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 के तहत अदालत का रुख करते हुए बच्ची की संरक्षक नियुक्ति की मांग की थी।
फैमिली कोर्ट ने मई 2025 में एक अंतरिम आदेश पारित कर मां को बच्ची की कस्टडी में हस्तक्षेप करने से रोक दिया था। बाद में जनवरी 2026 में यह आदेश जारी रखा गया, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि वह बच्ची की प्राकृतिक संरक्षक (natural guardian) हैं और जन्म से लेकर मई 2025 तक बच्ची की पूरी देखभाल उन्होंने ही की। अदालत को बताया गया कि बच्ची की पढ़ाई, स्वास्थ्य, टीकाकरण, स्कूल गतिविधियों और भावनात्मक विकास का जिम्मा हमेशा मां ने संभाला।
मां की ओर से यह भी कहा गया कि बच्ची को उनसे लंबे समय तक अलग रखने से उसके मानसिक और भावनात्मक विकास पर असर पड़ सकता है।
न्यायमूर्ति डॉ. के. मनमधा राव की पीठ ने कहा कि यह विवाद दो प्राकृतिक अभिभावकों के बीच नहीं, बल्कि मां और अन्य रिश्तेदारों के बीच है। ऐसे मामलों में अदालत को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट कहा,
“किसी अंतरिम आदेश के जरिए प्राकृतिक माता-पिता को बच्चे से पूरी तरह दूर नहीं किया जा सकता, जब तक रिकॉर्ड पर ऐसा कोई मजबूत आधार न हो जो माता-पिता की अयोग्यता या बच्चे के लिए वास्तविक खतरे को दर्शाए।”
कोर्ट ने यह भी माना कि बच्ची की परीक्षाओं और दिनचर्या को ध्यान में रखते हुए मुलाकात को नियंत्रित किया जा सकता था, लेकिन मां से पूरी तरह दूरी बनाना उचित नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने बच्ची से बातचीत की थी, लेकिन उस बातचीत को अंतिम आधार नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब बच्ची लंबे समय से दादी और बुआ की देखरेख में रह रही हो। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में “प्रभाव या भावनात्मक दबाव” की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का 12 जनवरी 2026 का आदेश रद्द कर दिया और मां के खिलाफ लगाया गया प्रतिबंध हटा दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने केवल अंतरिम निषेधाज्ञा (injunction) की वैधता पर फैसला दिया है। बच्ची की स्थायी कस्टडी, मुलाकात अधिकार और संरक्षक नियुक्ति से जुड़े मुद्दों पर अंतिम निर्णय फैमिली कोर्ट ही करेगा।
Case Details:
Case Title: Mrs. Shruti Sood alias Shruti Banerji v. Mrs. Sarita Banerji & Anr.
Case Number: W.P. No. 5971 of 2026 c/w W.P. No. 4443 of 2026
Judge: Justice Dr. K. Manmadha Rao
Decision Date: April 24, 2026











