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गिरफ्तारी के आधार लिखित न देने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, डॉक्टरों को मिली जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार लिखित न देने पर गिरफ्तारी अवैध हो सकती है और आरोपियों को जमानत मिल सकती है। - डॉ. राजिंदर राजन बनाम भारत संघ एवं अन्य।

Vivek G.
गिरफ्तारी के आधार लिखित न देने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, डॉक्टरों को मिली जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि किसी भी आरोपी को गिरफ्तारी के स्पष्ट आधार (grounds of arrest) लिखित रूप में बताना अनिवार्य है। इस संवैधानिक प्रक्रिया का पालन न होने पर गिरफ्तारी अवैध मानी जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस मामले में अमृतसर के एक अस्पताल और उसकी फार्मेसी से जुड़े डॉ. राजिंदर राजन और डॉ. जतिंदर मल्होत्रा ​​शामिल थे। रिकॉर्ड के अनुसार, आपूर्तिकर्ता की गलती के कारण ट्रामडोल की 2,000 गोलियों की खेप पहुंचाई गई, जबकि केवल 200 गोलियों का ही ऑर्डर दिया गया था।

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अतिरिक्त स्टॉक वापस करने से पहले ही, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने छापा मारकर गोलियां जब्त कर लीं। बाद में डॉक्टरों को नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को उसके खिलाफ आरोपों की जानकारी देना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है।

अदालत ने कहा,

“गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में बताना संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत अनिवार्य है।”

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पीठ ने यह भी पाया कि इस मामले में केवल गिरफ्तारी मेमो में एक सामान्य उल्लेख था कि आरोपी को आधार बता दिए गए हैं, लेकिन उन्हें लिखित रूप में नहीं दिया गया।

अदालत ने मिहिर राजेश शाह मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो गिरफ्तारी अवैध हो जाती है।

सरकार की ओर से दलील दी गई कि गिरफ्तारी के आधार मौखिक रूप से समझाए गए थे और गिरफ्तारी मेमो में इसका उल्लेख भी है।

लेकिन कोर्ट ने इसे पर्याप्त नहीं माना और कहा कि लिखित जानकारी देना अनिवार्य है, केवल मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं है।

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अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए, जो कि कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया का उल्लंघन है।

इस आधार पर कोर्ट ने आदेश दिया कि दोनों अपीलकर्ताओं को जमानत पर तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते वे ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करें।

Case Details:

Case Title: Dr. Rajinder Rajan v. Union of India & Anr.

Case Number: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) Nos. 3326–3327 of 2026

Judge: Justice Vikram Nath & Justice Sandeep Mehta

Decision Date: April 1, 2026

Counsels: Shri S. Nagamuthu, Shri P.V. Dinesh (for appellants); Shri Anil Kaushik, ASG (for respondents)

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