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झारखंड हाई कोर्ट सख्त: 120 दिनों में सभी जिला अस्पतालों व मेडिकल कॉलेजों में चालू हों बर्न यूनिट

झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य को 120 दिनों के भीतर सभी बर्न यूनिटों को पूरी तरह से चालू करने का निर्देश दिया है, जिसमें एक अग्नि त्रासदी के बाद स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना में गंभीर कमियों को उजागर किया गया है। - ओंकार विश्वकर्मा बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य।

Shivam Y.
झारखंड हाई कोर्ट सख्त: 120 दिनों में सभी जिला अस्पतालों व मेडिकल कॉलेजों में चालू हों बर्न यूनिट

झारखंड हाई कोर्ट ने हजारीबाग के केरोसिन आग हादसे से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने साफ कहा कि बर्न मरीजों के इलाज के लिए पर्याप्त सुविधाओं का अभाव, संविधान के तहत जीवन के अधिकार को कमजोर करता है। यह मामला केवल एक दुर्घटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे राज्य में चिकित्सा ढांचे की स्थिति को सामने ले आया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह याचिका हजारीबाग में हुए एक दर्दनाक हादसे के बाद दायर की गई थी, जहां कथित रूप से सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिले केरोसिन के कारण आग लग गई। इस घटना में चार लोगों की मौत हो गई, जिनमें एक दो वर्षीय बच्चा और एक बुजुर्ग महिला भी शामिल थे, जबकि करीब 15 लोग गंभीर रूप से झुलस गए और कई को स्थायी चोटें आईं।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि घायल मरीजों को उचित इलाज नहीं मिल सका। अस्पताल में बर्न यूनिट की कमी के कारण उन्हें सामान्य वार्ड में रखा गया, और कई आवश्यक दवाइयाँ बाहर से खरीदनी पड़ीं। यह भी आरोप लगाया गया कि संबंधित अधिकारियों को शिकायत देने के बावजूद समय पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि यह समस्या केवल एक जिले तक सीमित नहीं है। राज्य के विभिन्न अस्पतालों में बर्न यूनिट्स या तो मौजूद नहीं हैं या पूरी तरह कार्यशील नहीं हैं।

अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा,

“यदि सरकारी अस्पतालों में आधुनिक बर्न यूनिट उपलब्ध नहीं हैं, तो जीवन के अधिकार की संवैधानिक गारंटी केवल कागजों तक सीमित रह जाती है।”

कोर्ट ने राज्य सरकार के दावों में भी विसंगतियां पाईं। जहां सरकार ने सभी जिलों में बर्न यूनिट्स होने का दावा किया, वहीं रिकॉर्ड में यह संख्या कम पाई गई। अदालत ने इसे केवल कागजी व्यवस्था बताते हुए कहा कि वास्तविक चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है।

याचिका में मृतकों और घायलों के लिए निश्चित राशि में मुआवजा देने की मांग की गई थी। हालांकि अदालत ने इस पर सीधे आदेश देने से इनकार किया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजे की राशि तय करने के लिए तथ्यों और साक्ष्यों की जांच जरूरी होती है, जो इस प्रकार की जनहित याचिका में संभव नहीं है। इसलिए पीड़ितों को उचित मंच पर जाकर दावा करने की सलाह दी गई।

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साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि पीड़ित और उनके परिजन कानून के तहत उपलब्ध योजनाओं के माध्यम से मुआवजा पाने के हकदार हैं और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण उनकी सहायता करेगा।

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी जिला अस्पतालों और सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बर्न यूनिट्स को 120 दिनों के भीतर पूरी तरह कार्यशील बनाया जाए। इन यूनिट्स में प्रशिक्षित डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, आवश्यक उपकरण और दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

इसके साथ ही यह भी कहा गया कि बर्न मरीजों का इलाज सामान्य वार्ड में नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें विशेष रूप से तैयार किए गए बर्न यूनिट में रखा जाए।

अदालत ने राज्य स्तर पर एक निगरानी समिति बनाने का भी निर्देश दिया, जो इन व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा करेगी। यह समिति हर तीन महीने में बैठक कर कमियों को दूर करने की प्रक्रिया सुनिश्चित करेगी।

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पीड़ितों के संदर्भ में अदालत ने कहा कि यदि वे स्वयं आवेदन करने में सक्षम नहीं हैं, तो जिला विधिक सेवा प्राधिकरण उनकी पहचान कर उन्हें मुआवजा प्राप्त करने की प्रक्रिया में मदद करेगा। संबंधित अदालतों को भी निर्देश दिया गया कि ऐसे मामलों का निपटारा यथासंभव शीघ्र किया जाए।

अंत में अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि तत्काल राहत से जुड़ी कुछ मांग अब समय के साथ अप्रासंगिक हो चुकी हैं। मुआवजे से संबंधित मुद्दों को संबंधित अदालतों पर छोड़ते हुए, हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह तय समयसीमा के भीतर बर्न केयर से जुड़ी सुविधाओं को सुधारकर उन्हें प्रभावी रूप से लागू करे।

Case Details

Case Title: Onkar Vishwakarma v. State of Jharkhand & Ors.

Case Number: W.P. (PIL) No. 920 of 2021

Judge: Chief Justice M. S. Sonak & Justice Rajesh Shankar

Decision Date: 01 April 2026

Counsels:

  • Petitioner: Ms. Diksha Dwivedi (Amicus Curiae)
  • Respondents: Mr. Piyush Chitresh (A.C. to A.G.)

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