मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

बिजली ड्यूटी छूट वापस लेने का अधिकार राज्य को; उद्योगों को देना होगा नोटिस: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य बिजली ड्यूटी छूट वापस ले सकता है, लेकिन उद्योगों को समायोजन के लिए एक साल का नोटिस देना अनिवार्य होगा। - महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य बनाम रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड एवं अन्य।

Vivek G.
बिजली ड्यूटी छूट वापस लेने का अधिकार राज्य को; उद्योगों को देना होगा नोटिस: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और रिलायंस इंडस्ट्रीज़ समेत अन्य कंपनियों के बीच लंबे समय से चल रहे बिजली ड्यूटी विवाद पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने साफ किया कि राज्य सरकार को दी गई छूट वापस लेने या बदलने का अधिकार है, लेकिन यह प्रक्रिया उचित और न्यायसंगत होनी चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद बिजली ड्यूटी से संबंधित छूट को लेकर था, जो महाराष्ट्र सरकार ने उद्योगों को अपने “कैप्टिव पावर प्लांट” (स्वयं के उपयोग के लिए बिजली उत्पादन) के लिए दी थी।

1994 से उद्योगों को इस तरह की छूट मिल रही थी, ताकि वे खुद बिजली पैदा कर सकें और सरकारी बिजली पर निर्भरता कम हो। लेकिन 2000 और 2001 में जारी नोटिफिकेशन के जरिए सरकार ने इस छूट को सीमित या आंशिक रूप से वापस ले लिया।

Read also:- नियोक्ता की चूक के लिए कर्मचारियों को दंडित नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाई कोर्ट ने EPFO की उच्च पेंशन याचिका की अस्वीकृति रद्द की

इस बदलाव को उद्योगों ने बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी, जहां हाई कोर्ट ने इन नोटिफिकेशन को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताते हुए रद्द कर दिया था।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि टैक्स या ड्यूटी में दी गई छूट कोई स्थायी अधिकार नहीं होती, बल्कि यह एक “रियायत” (concession) है।

पीठ ने स्पष्ट किया,

“छूट एक ऐसा लाभ है जिसे सरकार सार्वजनिक हित में कभी भी बदल या वापस ले सकती है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि उद्योगों को यह समझना चाहिए कि ऐसी नीतियाँ समय के साथ बदल सकती हैं, खासकर जब राज्य को राजस्व बढ़ाने की आवश्यकता हो।

साथ ही, अदालत ने माना कि सरकार का यह तर्क उचित है कि बजटीय घाटा और राजस्व की जरूरतें ऐसी नीतियों में बदलाव का आधार बन सकती हैं।

Read also:- दिल्ली दंगा केस में पुलिस जांच पर सवाल,दिल्ली उच्च न्यायालय ने रिहाई आदेश बरकरार रखा

हालांकि कोर्ट ने सरकार के अधिकार को सही ठहराया, लेकिन यह भी कहा कि इस अधिकार का इस्तेमाल “न्यायसंगत और निष्पक्ष” तरीके से होना चाहिए।

पीठ ने कहा,

“अचानक नीति बदलने से उन उद्योगों पर अनावश्यक बोझ पड़ सकता है, जिन्होंने पहले की नीति के आधार पर निवेश किया है।”

कोर्ट ने यह माना कि उद्योगों ने वर्षों तक इस छूट के आधार पर अपने वित्तीय और संचालन संबंधी फैसले लिए थे। इसलिए अचानक बदलाव उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और राज्य सरकार के अधिकार को बरकरार रखा।

Read also:- गुरुग्राम POCSO मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त: पुलिस जांच पर उठाए सवाल, SIT गठित

हालांकि, अदालत ने महत्वपूर्ण राहत देते हुए कहा कि 2000 और 2001 के नोटिफिकेशन तुरंत लागू नहीं होंगे।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

  • इन नोटिफिकेशन को लागू करने से पहले एक वर्ष का उचित नोटिस दिया जाना चाहिए
  • ताकि उद्योग अपने वित्तीय और संचालन ढांचे को समायोजित कर सकें

अंततः, अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को छूट वापस लेने का अधिकार है, लेकिन यह प्रक्रिया संतुलित और उचित होनी चाहिए।

Case Details

Case Title: State of Maharashtra & Ors. vs Reliance Industries Ltd. & Ors.

Case Number: Civil Appeal Nos. 3012–3026 of 2010 (with connected matters)

Judges: Justice Alok Aradhe, Justice Pamidighantam Sri Narasimha

Decision Date: March 25, 2026

More Stories