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दिल्ली हाईकोर्ट ने कर्मचारी की बर्खास्तगी को ठहराया सही, वित्तीय अनियमितताओं के मामले में राहत से इनकार

दिल्ली हाईकोर्ट ने वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में कर्मचारी की बर्खास्तगी को सही ठहराया, कहा - न्यायाधिकरण के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं। - उमा शंकर शर्मा बनाम राज्य (एनसीटी सरकार) एवं अन्य।

Shivam Y.
दिल्ली हाईकोर्ट ने कर्मचारी की बर्खास्तगी को ठहराया सही, वित्तीय अनियमितताओं के मामले में राहत से इनकार

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक लंबे समय से चल रहे श्रम विवाद में कर्मचारी को कोई राहत देने से इनकार करते हुए उसकी सेवा समाप्ति को वैध करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब वित्तीय अनियमितता साबित हो जाए, तो न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होता है।

Background of the Case

यह मामला उमा शंकर शर्मा बनाम राज्य (NCT दिल्ली) व अन्य से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता एक सेल्स क्लर्क के रूप में कार्यरत थे। उन पर 1986 से 1989 के बीच खातों में गड़बड़ी और धन के गलत उपयोग के आरोप लगे।

प्रबंधन ने दावा किया कि लगभग ₹40,000 से अधिक की राशि का हिसाब नहीं दिया गया। बाद में आंतरिक जांच के बाद कर्मचारी की सेवा 30 जून 1989 को समाप्त कर दी गई।

मामला औद्योगिक न्यायाधिकरण पहुंचा, जहां कर्मचारी ने बर्खास्तगी को अवैध बताया, लेकिन 2002 में न्यायाधिकरण ने प्रबंधन के पक्ष में फैसला दिया।

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न्यायमूर्ति शैल जैन की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि उच्च न्यायालय की भूमिका अपीलीय अदालत जैसी नहीं होती।

अदालत ने कहा,

“उच्च न्यायालय साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकता जब तक कि निष्कर्ष पूरी तरह से गलत या बिना आधार के न हों।”

कोर्ट ने पाया कि:

  • कर्मचारी ने कई दस्तावेजों पर स्वयं यह स्वीकार किया था कि कुछ रकम खातों में दर्ज नहीं हुई।
  • उसने बाद में रकम जमा करने की बात भी लिखित रूप में कही थी।
  • कथित दबाव या धमकी के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस विवरण या साक्ष्य नहीं दिया गया।

अदालत ने यह भी नोट किया कि कर्मचारी के बयान समय-समय पर बदलते रहे, जिससे उसकी विश्वसनीयता प्रभावित हुई।

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हालांकि प्रारंभिक विभागीय जांच को न्यायाधिकरण ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना था, लेकिन प्रबंधन को साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया।

कोर्ट ने माना कि:

“न्यायाधिकरण ने दस्तावेजों और स्वयं कर्मचारी की स्वीकारोक्ति के आधार पर निष्कर्ष निकाला, जो पर्याप्त साक्ष्य है।”

इसलिए, केवल इस आधार पर कि स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किए गए, निष्कर्ष को अवैध नहीं कहा जा सकता।

कर्मचारी ने यह तर्क दिया कि उसकी लंबी सेवा को देखते हुए सजा कठोर है।

इस पर अदालत ने कहा,

“यह मामला तीन वर्षों तक लगातार वित्तीय अनियमितताओं का है, जिससे नियोक्ता का विश्वास समाप्त हो गया।”

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कोर्ट ने माना कि वित्तीय मामलों में विश्वास महत्वपूर्ण होता है और एक बार यह टूट जाए तो सेवा जारी रखना संभव नहीं है।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि:

  • न्यायाधिकरण का निर्णय साक्ष्यों पर आधारित है
  • इसमें कोई कानूनी त्रुटि या मनमानी नहीं है
  • सजा परिस्थितियों के अनुरूप है

अंततः, दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी और कर्मचारी की बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Uma Shankar Sharma v. State (Govt. of NCT) & Anr.

Case Number: W.P.(C) 6999/2002

Judge: Justice Shail Jain

Decision Date: April 8, 2026

Counsels:

  • Petitioner: Mr. Anil Singhal, Mr. Abhimanyu Sharma
  • Respondents: Ms. Anju Bhattacharya, Ms. Nisha R. Chauhan, Mr. Vinod Fulara, Ms. Sakshi Ramola

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