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सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में सजा बहाल की, मामूली विरोधाभासों के आधार पर बरी करना गलत

Supreme Court restores conviction in a minor assault case, ruling that minor inconsistencies in testimony cannot override credible evidence of the victim.204सुप्रीम कोर्ट ने मामूली हमले के एक मामले में दोषसिद्धि को बहाल करते हुए यह फैसला दिया कि गवाही में मौजूद छोटी-मोटी विसंगतियां पीड़ित के विश्वसनीय सबूतों पर भारी नहीं पड़ सकतीं। - हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम हुकुम चंद @ मोनू

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म मामले में सजा बहाल की, मामूली विरोधाभासों के आधार पर बरी करना गलत

सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2026 को एक अहम फैसले में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक आरोपी को नाबालिग लड़की से यौन उत्पीड़न के मामले में बरी कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि गवाहों के बयानों में छोटे-मोटे विरोधाभास गंभीर अपराध के मामलों में निर्णायक नहीं हो सकते।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 27 अगस्त 2007 का है। एक नौ साल की बच्ची को उसकी मां ने छाछ लाने के लिए भेजा था। लौटते समय पड़ोस के एक युवक ने उसे कथित तौर पर गायशाला में ले जाकर यौन उत्पीड़न किया।

बच्ची ने घर लौटकर यह बात अपनी मां को बताई, और बाद में पिता को जानकारी दी गई। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और बच्ची का मेडिकल परीक्षण हुआ। रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न के संकेत मिले।

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ट्रायल कोर्ट ने बच्ची के बयान, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य गवाहों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराया और सजा सुनाई।

हालांकि, हाई कोर्ट ने बाद में इस सजा को पलट दिया। उसने गवाहों के बयानों में विरोधाभास, FIR दर्ज करने में देरी और घटना की परिस्थितियों पर सवाल उठाए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस दृष्टिकोण से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि पूरे मामले में छोटे-छोटे अंतर ढूंढने की कोशिश की गई, जबकि मुख्य तथ्य मजबूत थे।

अदालत ने कहा,

“यह तरीका ऐसा है जिसमें एक ऐसे मामले में खामियां खोजी जा रही हैं जो जिरह की कसौटी पर खरा उतरा है।”

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इंसानी याददाश्त और बयान पूरी तरह एक जैसे नहीं होते। मामूली अंतर स्वाभाविक हैं और इन्हें आधार बनाकर पूरे मामले को खारिज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी दोहराया कि यौन उत्पीड़न के मामलों में यदि पीड़िता का बयान भरोसेमंद है, तो केवल उसी के आधार पर भी सजा दी जा सकती है।

हाई कोर्ट द्वारा उठाए गए दूरी और समय के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में गणितीय सटीकता जरूरी नहीं होती। समय में थोड़ा अंतर होने से घटना झूठी नहीं हो जाती।

मेडिकल साक्ष्य के बारे में कोर्ट ने कहा कि यह पीड़िता के बयान का समर्थन करता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि रिकॉर्ड में पीड़िता की पहचान उजागर की गई थी।

अदालत ने कहा कि कानून ऐसे मामलों में पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करने की अनुमति नहीं देता और इस नियम का सख्ती से पालन होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का बरी करने वाला फैसला रद्द कर दिया और आरोपी की सजा बहाल कर दी।

राज्य की अपील स्वीकार करते हुए अदालत ने आरोपी को तुरंत आत्मसमर्पण करने और बाकी सजा पूरी करने का निर्देश दिया।

Case Details

Case Title: State of Himachal Pradesh vs Hukum Chand @ Monu

Case Number: Criminal Appeal No. 1275 of 2015
(Arising out of SLP (Crl.) No. 9574 of 2018)

Bench / Judges: Justice Sanjay Karol and Justice Nongmeikapam Kotiswar Singh

Decision Date: March 24, 2026

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