सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में पहले ही संज्ञान (cognizance) लिया जा चुका है, तो बाद में आए सरकारी नोटिफिकेशन का लाभ आरोपी को नहीं दिया जा सकता। अदालत ने पुलिस अधिकारियों की अपील को खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में अभियोजन जारी रहेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक महिला द्वारा दायर शिकायत से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पुलिस अधिकारियों ने उसके पति की हत्या की। मजिस्ट्रेट ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं के तहत तलब किया था।
बाद में, एक सह-आरोपी अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली थी, क्योंकि उसके खिलाफ अभियोजन के लिए सरकारी अनुमति (sanction) नहीं ली गई थी। इसके बाद अन्य आरोपियों ने भी उसी आधार पर राहत की मांग की।
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अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि राज्य सरकार द्वारा 2010 में जारी एक अधिसूचना के तहत अब निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों को भी सुरक्षा (Section 197 CrPC) प्राप्त है।
उनका कहना था कि घटना ड्यूटी के दौरान हुई थी, इसलिए बिना सरकारी अनुमति के उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।
शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि यह एक गंभीर और क्रूर हत्या का मामला है।
उन्होंने तर्क दिया कि:
- जब अदालत ने 2001 में संज्ञान लिया था, उस समय ऐसी कोई सुरक्षा लागू नहीं थी
- बाद में आई अधिसूचना का पुराने मामलों पर असर नहीं पड़ता
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि पहले सह-आरोपी को मिली राहत केवल तकनीकी आधार (sanction की कमी) पर थी, न कि इस आधार पर कि अपराध नहीं हुआ।
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अदालत ने कहा:
“सिर्फ इसलिए कि एक सह-आरोपी को राहत मिली थी, अन्य आरोपियों को स्वतः वही लाभ नहीं मिल सकता।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि:
“Section 197 CrPC का संरक्षण केवल उन्हीं अधिकारियों को मिलता है जिन्हें हटाने के लिए सरकार की अनुमति आवश्यक हो।”
न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्ता उस श्रेणी में नहीं आते थे।
2010 की अधिसूचना पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि:
“कानूनी रोक (bar) संज्ञान लेने के समय लागू होती है, बाद में लागू नहीं की जा सकती।”
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अर्थात, यदि संज्ञान उस समय वैध था, तो बाद में आई अधिसूचना उसे अमान्य नहीं बना सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:
- अपीलकर्ताओं को Section 197 का संरक्षण उपलब्ध नहीं है
- 2010 की अधिसूचना इस मामले पर लागू नहीं होती
- हाईकोर्ट का आदेश सही था
इसी आधार पर अदालत ने अपील को खारिज कर दिया और स्पष्ट किया कि उसने आरोपों के गुण-दोष (merits) पर कोई राय नहीं दी है।
Case Details
Case Title: Samrendra Nath Kundu & Anr. vs Sadhana Das & Anr.
Case Number: Criminal Appeal No. 654 of 2013
Judge: Justice Manoj Misra with Justice J.B. Pardiwala
Decision Date: April 1, 2026










