दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार (20 अप्रैल) को आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल की उस अर्जी पर सुनवाई करते हुए उनकी ओर से दाखिल rejoinder को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति दे दी, जिसमें उन्होंने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ recusal (खुद को मामले से अलग करने) की मांग की है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला कथित शराब नीति (liquor policy) केस से जुड़ा है, जिसमें केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने आरोपियों को मिली राहत (discharge) को चुनौती दी है। केजरीवाल ने न्यायाधीश की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके बच्चों का केंद्र सरकार के पैनल से पेशेवर संबंध है, जिससे पक्षपात की आशंका बनती है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होकर केजरीवाल ने आग्रह किया कि CBI के लिखित जवाब पर उनका rejoinder भी रिकॉर्ड पर लिया जाए। उनका कहना था कि यह मुद्दा न्यायिक निष्पक्षता से सीधे जुड़ा है।
वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कानून में लिखित दलीलों के बाद rejoinder दाखिल करने का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि मामला पहले ही आदेश के लिए सुरक्षित (reserved) किया जा चुका है, इसलिए नई दलीलें स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
जस्टिस शर्मा ने प्रक्रिया की सीमाओं को स्वीकार करते हुए, मामले की प्रकृति को देखते हुए अपवाद बनाया।
कोर्ट ने कहा,
“लिखित दलीलों के बाद rejoinder दाखिल करने की अनुमति नहीं होती। लेकिन चूंकि पक्षपात के आरोप लगाए गए हैं, इसलिए इसे लिखित सबमिशन के रूप में रिकॉर्ड पर लिया जा रहा है।”
अदालत ने केजरीवाल के rejoinder को लिखित दलीलों के रूप में स्वीकार कर रिकॉर्ड पर ले लिया। साथ ही, पहले तय समय पर आदेश सुनाने के बजाय उसे दिन में बाद के लिए स्थगित कर दिया।











