मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

सुप्रीम कोर्ट: गोद लेने वाली माताओं के साथ भेदभाव नहीं हो सकता, मातृत्व केवल जैविक जन्म तक सीमित नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मातृत्व केवल जैविक जन्म तक सीमित नहीं है। गोद लेने वाली माताओं को भी समान सम्मान और अधिकार मिलना चाहिए क्योंकि बच्चे के विकास में मातृत्व महत्वपूर्ण है। - हमसानंदिनी नंदूरी बनाम भारत संघ एवं अन्य

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट: गोद लेने वाली माताओं के साथ भेदभाव नहीं हो सकता, मातृत्व केवल जैविक जन्म तक सीमित नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व लाभ से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि मातृत्व केवल जैविक प्रक्रिया नहीं बल्कि एक भावनात्मक और सामाजिक अनुभव भी है। अदालत ने कहा कि गोद लेने वाली मां और जैविक मां के बीच केवल जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि मातृत्व का उद्देश्य केवल बच्चे के जन्म से जुड़ा नहीं है, बल्कि बच्चे की देखभाल, भावनात्मक जुड़ाव और परिवार में उसके समायोजन से भी जुड़ा है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला हंसानंदिनी नंदुरी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जो स्वयं दो बच्चों की दत्तक मां हैं। उन्होंने याचिका में Maternity Benefit Act, 1961 के प्रावधान को चुनौती दी।

याचिका में कहा गया कि कानून के तहत केवल उन महिलाओं को 12 सप्ताह का मातृत्व लाभ मिलता है जो तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती हैं।

Read also:- निजी हित छिपाकर PIL दाखिल करने पर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त, याचिकाकर्ता को ₹25 लाख लागत का नोटिस

याचिकाकर्ता का तर्क था कि तीन महीने की यह सीमा अनुचित है और यह Code on Social Security, 2020 की धारा 60(4) में भी जारी है।

उनका कहना था कि इससे तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व लाभ से वंचित कर दिया जाता है, जो समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि दत्तक ग्रहण की कानूनी प्रक्रिया स्वयं लंबी होती है।

अक्सर बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेने की अनुमति मिलने तक उसकी उम्र तीन महीने से अधिक हो जाती है।

इस कारण अधिकांश मामलों में adoptive mothers को मातृत्व लाभ का अधिकार ही नहीं मिल पाता।

Read also:- आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भर्ती पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ग्रेजुएट उम्मीदवार 29% कोटे में भी कर सकते हैं आवेदन

सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि तीन महीने की सीमा उचित है क्योंकि नवजात शिशु को अधिक देखभाल की आवश्यकता होती है।

उन्होंने यह भी कहा कि अन्य स्थितियों में कार्यस्थल पर उपलब्ध क्रेच सुविधाओं का उपयोग किया जा सकता है।

न्यायमूर्ति परदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि मातृत्व को केवल जैविक जन्म से जोड़ना एक संकीर्ण दृष्टिकोण है।

अदालत ने कहा:

“मातृत्व केवल बच्चे को जन्म देने से परिभाषित नहीं होता, बल्कि बच्चे की देखभाल, प्रेम और भावनात्मक संबंध से भी जुड़ा होता है।”

Read also:- मुआवजा मामला, ट्रेन यात्रा के दौरान दुर्घटना होने पर रेलवे जिम्मेदारी से बच नहीं सकता: गुजरात उच्च न्यायालय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मातृत्व अवकाश के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं:

  1. मां को शारीरिक और मानसिक रूप से समय देना
  2. मां और बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध विकसित करना
  3. बच्चे की देखभाल और उसे परिवार में समायोजित करने के लिए समय देना

अदालत ने कहा कि गोद लेने के मामलों में भी दूसरे और तीसरे उद्देश्य समान रूप से लागू होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मातृत्व संरक्षण एक मूल मानव अधिकार है और इसका उद्देश्य महिलाओं की कार्यस्थल पर समान भागीदारी सुनिश्चित करना है।

अदालत ने यह भी कहा कि सामाजिक कल्याण से जुड़े कानूनों की व्याख्या व्यापक और उद्देश्यपूर्ण तरीके से की जानी चाहिए।

न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि adoptive mothers को भी सम्मान और अधिकारों के मामले में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं झेलना चाहिए।

Case Title: Hamsaanandini Nanduri v Union of India & Ors

Case Number: Writ Petition (Civil) No. 960 of 2021

Judge: Justice Pardiwala and Justice R. Mahadevan

More Stories