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दिल्ली हाई कोर्ट ने ₹72 लाख की रिकवरी डिक्री को बरकरार रखा; कहा कि साइन किया हुआ अकाउंट कन्फर्मेशन एक लिखित कॉन्ट्रैक्ट के बराबर है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने ज़वेनिर डेवलपर्स के पक्ष में ₹72 लाख से ज़्यादा की रिकवरी डिक्री को बरकरार रखा; कोर्ट ने प्रतिवादी की चुनौती को खारिज कर दिया और 9% सालाना की दर से भविष्य का ब्याज देने का आदेश दिया। - ज़वेनिर डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम संदीप गोयल और संबंधित अपील

Shivam Y.
दिल्ली हाई कोर्ट ने ₹72 लाख की रिकवरी डिक्री को बरकरार रखा; कहा कि साइन किया हुआ अकाउंट कन्फर्मेशन एक लिखित कॉन्ट्रैक्ट के बराबर है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में रियल एस्टेट कंपनी जावेनिर डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में पारित ₹72 लाख से अधिक की रिकवरी डिक्री को बरकरार रखा है। अदालत ने चार्टर्ड अकाउंटेंट संदीप गोयल की अपील खारिज करते हुए कहा कि उनके द्वारा हस्ताक्षरित "कन्फर्मेशन ऑफ अकाउंट्स" देनदारी की स्पष्ट स्वीकारोक्ति है। साथ ही अदालत ने कंपनी को डिक्री की तारीख से भुगतान होने तक 9 प्रतिशत वार्षिक भविष्य ब्याज (Future Interest) देने का भी निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

जावेनिर डेवलपर्स का दावा था कि सितंबर 2018 में संदीप गोयल ने व्यवसायिक आवश्यकता के लिए ₹50 लाख की वित्तीय सहायता मांगी थी। कंपनी ने यह राशि दो बैंक ट्रांजैक्शन के माध्यम से उनके खाते में भेजी। कंपनी के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज तथा तिमाही आधार पर ब्याज जोड़ने की सहमति हुई थी।

कंपनी ने आरोप लगाया कि निर्धारित अवधि बीतने के बावजूद राशि वापस नहीं की गई। इसके बाद कंपनी ने मूलधन और ब्याज सहित ₹72,13,890 की वसूली के लिए सारांश वाद (Summary Suit) दायर किया।

दूसरी ओर, संदीप गोयल ने दावा किया कि यह कोई ऋण नहीं था। उनका कहना था कि उन्होंने पहले कंपनी के निदेशकों के लिए ₹50 लाख नकद की व्यवस्था की थी और बाद में बैंक के माध्यम से मिली राशि उसी का भुगतान थी। इस दावे के समर्थन में उन्होंने व्हाट्सएप चैट का भी हवाला दिया।

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए कहा कि ₹50 लाख की बैंक ट्रांसफर राशि विवादित नहीं है। अदालत ने विशेष रूप से 1 अप्रैल 2019 के "कन्फर्मेशन ऑफ अकाउंट्स" दस्तावेज पर भरोसा किया, जिस पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर मौजूद थे।

अदालत ने कहा, “यह कन्फर्मेशन लेटर न केवल एक लिखित अनुबंध के रूप में कार्य करता है, बल्कि इसमें ऋण की शर्तें और देय राशि स्पष्ट रूप से दर्ज हैं, जिन्हें प्रतिवादी ने स्वीकार भी किया है।”

कोर्ट ने यह भी पाया कि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि कथित नकद राशि उन्होंने कहां से प्राप्त की थी या उसका कोई विश्वसनीय स्रोत क्या था।

फैसले में अदालत ने कहा कि प्रतिवादी द्वारा लिया गया बचाव “सिर्फ दिखावटी और आधारहीन” था तथा इससे कोई वास्तविक विवादित मुद्दा (Triable Issue) सामने नहीं आता।

कंपनी ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को भी चुनौती दी थी जिसमें लंबित मुकदमे की अवधि (Pendente Lite Period) के लिए ब्याज दर 15 प्रतिशत के बजाय 9 प्रतिशत तय की गई थी और भविष्य ब्याज नहीं दिया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 34 के तहत लंबित अवधि और डिक्री के बाद के ब्याज को लेकर अदालत को विवेकाधिकार प्राप्त है। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा 9 प्रतिशत ब्याज निर्धारित करने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं थी।

हालांकि, अदालत ने पाया कि भविष्य ब्याज न देने का कोई कारण दर्ज नहीं किया गया था। इसलिए कंपनी भविष्य ब्याज पाने की हकदार है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने संदीप गोयल की अपील खारिज कर दी और जावेनिर डेवलपर्स के पक्ष में पारित ₹72,13,890 की रिकवरी डिक्री को बरकरार रखा।

साथ ही अदालत ने कंपनी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आदेश में संशोधन किया और निर्देश दिया कि डिक्री की तारीख से वास्तविक भुगतान होने तक प्रतिवादी 9 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज का भी भुगतान करेगा।

Case Details:

Case Title: Zavenir Developers Pvt. Ltd. v. Sandeep Goel & Connected Appeal

Case Number: RFA 361/2024 & RFA 718/2024

Judge: Justice Neena Bansal Krishna

Decision Date: June 5, 2026

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