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दिल्ली उच्च न्यायालय ने पत्नी की भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी, पति की याचिका के खिलाफ बाल सहायता आदेश बरकरार रखा

श्रीमती गीता एवं अन्य. बनाम राज्य एवं अन्य। - दिल्ली HC ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा: पत्नी के लिए कोई गुजारा भत्ता नहीं, लेकिन पति को बच्चे के पालन-पोषण के लिए मासिक ₹16,000 का भुगतान करने का आदेश दिया।

Shivam Y.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने पत्नी की भरण-पोषण याचिका खारिज कर दी, पति की याचिका के खिलाफ बाल सहायता आदेश बरकरार रखा

दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को गीता और निशांत त्यागी द्वारा दायर दो आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया। दोनों अलग-अलग आदेश की चुनौती लेकर आए थे। पत्नी ने अपने लिए भरण-पोषण की मांग की थी, वहीं पति ने बेटी के लिए तय किए गए ₹16,000 मासिक भुगतान का विरोध किया था।

पृष्ठभूमि

गीता और निशांत की शादी 2009 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी। अगस्त 2010 में एक बेटी का जन्म हुआ। शादी के तुरंत बाद ही विवाद शुरू हो गए। गीता का आरोप था कि पति और ससुराल वालों ने उसके साथ शारीरिक, मानसिक और आर्थिक उत्पीड़न किया। विवश होकर वह मायके में रहने लगी और दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत परिवार न्यायालय में याचिका दायर कर ₹30,000 प्रति माह (₹20,000 अपने लिए और ₹10,000 बेटी के लिए) भरण-पोषण की मांग की।

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साल 2022 में परिवार न्यायालय ने आंशिक राहत दी। अदालत ने बेटी के लिए ₹16,000 मासिक भरण-पोषण मंजूर किया, लेकिन पत्नी की मांग को खारिज कर दिया।

अदालत की टिप्पणियाँ

न्यायमूर्ति स्वरना कांत शर्मा ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनते हुए परिवार न्यायालय की टिप्पणियों को दोबारा देखा। अदालत ने नोट किया कि गीता अस्थायी शिक्षक के रूप में कार्यरत है और लगभग ₹10,000 प्रतिमाह कमा रही है। इसके अलावा, उसके 2016 के वेतन पर्ची में ₹33,052 की आय दर्ज थी और 2017–18 के आयकर रिटर्न में वार्षिक आय ₹4 लाख से अधिक दर्शाई गई।

बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद उसने हाल की वेतन पर्ची या फॉर्म-16 दाखिल नहीं किया। अदालत ने कहा,

"पत्नी ने अपनी वास्तविक आय छिपाई और सबसे अहम दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए।"

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वहीं पति के तर्क कि बेटी के लिए ₹16,000 देना उसके लिए बोझ है, अदालत ने अस्वीकार कर दिया। निशांत उत्तरी रेलवे में कार्यरत है और करीब ₹58,000 मासिक आय स्वीकार कर चुका है।

न्यायालय ने कहा,

"बच्चे का भरण-पोषण का अधिकार माता-पिता के आपसी विवादों से स्वतंत्र है। पिता पर बच्चों का पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी है।"

अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी आय का लगभग एक-तिहाई हिस्सा बेटी के लिए देना न तो अत्यधिक है और न ही अनुचित।

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निर्णय

न्यायमूर्ति शर्मा ने अंत में कहा कि परिवार न्यायालय के आदेश में कोई "अवैधता या गंभीर त्रुटि" नहीं है। इसलिए पत्नी की भरण-पोषण याचिका और पति की पुनरीक्षण याचिका, दोनों को खारिज कर दिया गया।

इस प्रकार, हाई कोर्ट ने 2022 का आदेश बरकरार रखा: पत्नी को कोई आर्थिक सहायता नहीं, लेकिन बेटी के लिए हर महीने ₹16,000 की स्थायी व्यवस्था।

केस का शीर्षक:- श्रीमती. गीता एवं अन्य. बनाम राज्य एवं अन्य।

केस नं.:- CRL.REV.P. 395/2022

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