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विदेशी अदालत का आदेश बाध्यकारी नहीं: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने बाल कल्याण को प्राथमिकता देते हुए पिता की याचिका खारिज की

एमपी हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी में विदेशी अदालत का आदेश अंतिम नहीं है, और बच्चे का सर्वोत्तम हित ही सबसे महत्वपूर्ण मानदंड है। - अंकुर जोशी बनाम मध्य प्रदेश राज्य

Shivam Y.
विदेशी अदालत का आदेश बाध्यकारी नहीं: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने बाल कल्याण को प्राथमिकता देते हुए पिता की याचिका खारिज की

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया कि नाबालिग बच्चों की कस्टडी के मामलों में विदेशी अदालत का आदेश अंतिम नहीं होता। अदालत ने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण मानदंड बच्चे का “कल्याण और सर्वोत्तम हित” है। इसी आधार पर कोर्ट ने पिता की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज कर दी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अंकुर जोशी बनाम मध्य प्रदेश राज्य से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता पिता ने अपने दो नाबालिग बच्चों की कस्टडी की मांग की थी।

पिता का कहना था कि बच्चे अमेरिका में रहते थे और टेक्सास की एक अदालत ने उन्हें बच्चों का एकमात्र संरक्षक घोषित किया था। आरोप था कि मां बच्चों को भारत लेकर आई और वापस नहीं लौटी।

दूसरी ओर, मां ने तर्क दिया कि बच्चे अब भारत में बस चुके हैं, स्कूल जा रहे हैं और उनका वर्तमान वातावरण उनके हित में है।

अदालत के सामने तीन अहम सवाल थे:

  • क्या विदेशी अदालत के आदेश को सीधे लागू किया जा सकता है?
  • क्या बच्चों को भारत में रखना अवैध है?
  • बच्चों के सर्वोत्तम हित में क्या है?

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हैबियस कॉर्पस याचिका बच्चों की कस्टडी के मामलों में स्वीकार्य है, लेकिन इसका उपयोग केवल विदेशी आदेश लागू कराने के लिए नहीं किया जा सकता।

पीठ ने कहा,

“बच्चे की कस्टडी तय करते समय अदालत का मुख्य ध्यान केवल उसके कल्याण पर होना चाहिए, न कि माता-पिता के कानूनी अधिकारों पर।”

अदालत ने यह भी कहा कि विदेशी अदालत का आदेश एक महत्वपूर्ण कारक हो सकता है, लेकिन वह निर्णायक नहीं है।

कोर्ट ने बच्चों से सीधे बातचीत की और पाया कि वे अपनी मां के साथ सहज हैं और भारत में अच्छी तरह से स्थापित हो चुके हैं।

फैसले में कहा गया,

“बच्चे वर्तमान वातावरण में अच्छी तरह से रह रहे हैं, उनकी शिक्षा और भावनात्मक स्थिति स्थिर है।”

साथ ही अदालत ने यह भी नोट किया कि बच्चों की उम्र कम है और इस चरण में मां की देखभाल महत्वपूर्ण है।

हाईकोर्ट ने दोहराया कि “Comity of Courts” यानी अदालतों के बीच सम्मान जरूरी है, लेकिन यह बच्चे के हित से ऊपर नहीं हो सकता।

अदालत ने कहा कि विदेशी आदेश को केवल एक कारक माना जाएगा, न कि उसे यांत्रिक रूप से लागू किया जाएगा।

सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि बच्चों को पिता के पास अमेरिका भेजना उनके हित में नहीं होगा।

इसलिए, कोर्ट ने पिता की याचिका खारिज कर दी और बच्चों की कस्टडी मां के पास ही रहने दी।

Case Details

Case Title: Ankur Joshi v. State of Madhya Pradesh & Others

Case Number: WP No. 23561 of 2025

Judges: Justice Vijay Kumar Shukla & Justice Binod Kumar Dwivedi

Decision Date: 20 April 2026

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