मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 29 साल पुरानी जमीन एंट्री रद्द, धोखाधड़ी मानते हुए कलेक्टर का आदेश बहाल

सुलेमान अहमद मिन्टी बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य। गुजरात हाईकोर्ट ने 29 साल पुरानी जमीन की राजस्व एंट्री रद्द की, धोखाधड़ी मानते हुए कलेक्टर का आदेश बहाल किया।

Vivek G.
गुजरात हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 29 साल पुरानी जमीन एंट्री रद्द, धोखाधड़ी मानते हुए कलेक्टर का आदेश बहाल

अहमदाबाद स्थित गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 29 साल पुरानी जमीन की राजस्व एंट्री को रद्द कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि यदि कोई आदेश धोखाधड़ी से हासिल किया गया हो तो वह कानून की नजर में शून्य है। अदालत ने विशेष सचिव (राजस्व) के आदेश को निरस्त करते हुए कलेक्टर का फैसला बहाल कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद नवसारी जिले के जलालपुर तालुका के कंडोली गांव स्थित सर्वे नंबर 231 (पुराना सर्वे नंबर 224) की जमीन से जुड़ा है। यह जमीन मूल रूप से अहमद इस्माइल मिंटी की स्व-अर्जित संपत्ति थी।

Read also:- रूह अफजा पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: यूपी में 12.5% नहीं, 4% VAT लगेगा फल पेय के रूप में

याचिकाकर्ता सुलेमान अहमद मिंटी के पिता का निधन वर्ष 1977 में दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। मां का देहांत 1992 में हुआ। इससे पहले पिता ने वसीयत (Will) के जरिए जमीन याचिकाकर्ता के नाम कर दी थी, जिसकी प्रोबेट कार्यवाही बॉम्बे हाईकोर्ट में पूरी हुई थी।

लेकिन इसी दौरान, परिवार के एक रिश्तेदार ने 1984 में यह दिखाते हुए कि पिता की मृत्यु गुजरात में हुई, उत्तराधिकार एंट्री करवा ली। इस एंट्री के जरिए कुल 11 लोगों के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो गए।

याचिकाकर्ता को कैसे पता चला?

सुलेमान मिंटी लंबे समय तक विदेश में रहे। 2013 में जब वे भारत लौटे, तब उन्हें पता चला कि उनके पिता की जमीन में अन्य लोगों के नाम दर्ज हैं और यहां तक कि किरायेदारी (टेनेंसी) का दावा भी किया गया है।

उन्होंने आरटीएस अपील दायर की, लेकिन सहायक कलेक्टर ने 29 साल की देरी का हवाला देते हुए अपील खारिज कर दी। बाद में कलेक्टर ने इस आदेश को पलटते हुए एंट्री रद्द कर दी।

इसके खिलाफ निजी पक्ष ने विशेष सचिव (राजस्व विभाग) के समक्ष पुनरीक्षण दायर किया, जहां से मामला दोबारा कलेक्टर के पास भेज दिया गया। इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

Read also:- 60% दिव्यांग कर्मचारी की याचिका पर हाईकोर्ट सख्त, मामले को जनहित याचिका में बदला

अदालत की टिप्पणी

न्यायमूर्ति दिव्येश ए. जोशी ने सुनवाई के दौरान कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि 1984 में की गई एंट्री के समय याचिकाकर्ता की मां जीवित थीं, फिर भी उनका नाम दर्ज नहीं किया गया।

अदालत ने कहा:

“यदि कोई आदेश धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया हो तो वह कानून की नजर में अस्तित्वहीन है। ऐसे आदेश को किसी भी स्तर पर चुनौती दी जा सकती है।”

कोर्ट ने पाया कि उत्तराधिकार एंट्री करते समय राजस्व संहिता की धारा 135D के तहत आवश्यक नोटिस भी जारी नहीं किया गया था। यह प्रक्रिया का गंभीर उल्लंघन है।

देरी का मुद्दा: अदालत ने क्या कहा?

राज्य पक्ष ने 29 वर्ष की देरी को आधार बनाया। लेकिन कोर्ट ने कहा कि कारण-ए-कार्य (Cause of Action) ज्ञान की तारीख से शुरू होता है।

न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता को 2013 में जानकारी मिली और उन्होंने तुरंत अपील दायर की। इसलिए केवल तकनीकी देरी के आधार पर मामला खारिज करना उचित नहीं था।

Read also:- 40 साल पुराने दोहरे हत्याकांड में दोषियों को राहत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद बरकरार रखी

अंतिम फैसला

अदालत ने 19 जुलाई 2016 के विशेष सचिव (राजस्व) के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही 28 जनवरी 2015 के कलेक्टर, नवसारी के आदेश को बहाल कर दिया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि विवादित एंट्री नंबर 760 को रद्द किया जाए और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने के बाद याचिकाकर्ता का नाम विधि अनुसार दर्ज किया जाए।

Case Title: Suleiman Ahmed Minty vs State of Gujarat & Ors.

Case No.: R/Special Civil Application No.15609 of 2016 with 15610 of 2016

Decision Date: 18 February 2026

More Stories