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हस्ताक्षर से पहले सुनाए गए आदेश की रिपोर्टिंग पर अवमानना नहीं: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अखबारों के खिलाफ कार्रवाई खारिज की

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि खुले न्यायालय में सुनाए गए आदेश की निष्पक्ष और सही रिपोर्टिंग अवमानना नहीं है, भले ही आदेश पर अभी हस्ताक्षर न हुए हों।

Shivam Y.
हस्ताक्षर से पहले सुनाए गए आदेश की रिपोर्टिंग पर अवमानना नहीं: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अखबारों के खिलाफ कार्रवाई खारिज की

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उन समाचार पत्रों, संपादकों और रिपोर्टरों के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक अवमानना कार्यवाही को खारिज कर दिया, जिन्होंने अदालत द्वारा सुनाए गए लेकिन अभी हस्ताक्षरित न हुए आदेश की खबर प्रकाशित की थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि न्यायिक कार्यवाही की रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यात्मक है, तो उसे अवमानना नहीं माना जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद दो याचिकाओं से जुड़ा था जिनमें कोटकपूरा गोलीकांड से संबंधित मामलों की सुनवाई फरीदकोट से चंडीगढ़ स्थानांतरित करने की मांग की गई थी। 9 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए मुकदमों को चंडीगढ़ स्थानांतरित करने का आदेश दिया था।

हालांकि आदेश पर अभी औपचारिक हस्ताक्षर नहीं हुए थे, लेकिन अगले दिन द ट्रिब्यून, हिंदुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर प्रकाशित हुई कि हाईकोर्ट ने मामलों का ट्रायल चंडीगढ़ स्थानांतरित कर दिया है। इसके बाद एकल न्यायाधीश ने स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे अदालत की कार्यवाही में हस्तक्षेप का संभावित मामला माना और अवमानना कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया।

खंडपीठ ने संबंधित समाचार रिपोर्टों और मूल फैसले का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि अखबारों में प्रकाशित जानकारी तथ्यात्मक रूप से सही थी क्योंकि हाईकोर्ट ने वास्तव में मामलों को फरीदकोट से चंडीगढ़ स्थानांतरित किया था।

पीठ ने कहा कि रिपोर्टिंग में कोई असत्यता नहीं थी। न्यायालय ने अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 4 का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष और सटीक रिपोर्ट प्रकाशित करना अवमानना नहीं है।

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें सुरेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य प्रमुख है। इन निर्णयों में कहा गया है कि जब किसी फैसले की खुले न्यायालय में औपचारिक घोषणा कर दी जाती है, तो वह प्रभावी हो जाता है। उसके बाद हस्ताक्षर या अन्य औपचारिक प्रक्रियाएं केवल प्रमाणीकरण का हिस्सा होती हैं।

पीठ ने कहा, “समाचार पत्रों में की गई रिपोर्टिंग निष्पक्ष और सटीक थी, इसलिए इसे अदालत की अवमानना नहीं माना जा सकता।”

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि 9 अप्रैल 2026 को आदेश खुले न्यायालय में सुनाया जा चुका था और 10 अप्रैल को प्रकाशित समाचार उसी आदेश का सही प्रतिबिंब थे। इसलिए समाचार पत्रों, उनके संपादकों और रिपोर्टरों के खिलाफ आपराधिक अवमानना का कोई मामला नहीं बनता।

यह कहते हुए कि “समाचार पत्रों, संपादकों और रिपोर्टरों की कार्रवाई को आपराधिक अवमानना नहीं कहा जा सकता,” हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका को खारिज कर दिया और सभी लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया।

Case Details

Case Title: Court on Its Own Motion v. Jyoti Malhotra and Others

Case Number: CROCP-6-2026

Judges: Justice Jasgurpreet Singh Puri and Justice Amarjot Bhatti

Decision Date: May 6, 2026

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