केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में चेक बाउंस मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि जब आरोपी ने स्वेच्छा से अपराध स्वीकार किया हो, तो बाद में उसे चुनौती देना उचित नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला एक चेक बाउंस विवाद से जुड़ा है, जिसमें आरोपी के खिलाफ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। ट्रायल कोर्ट (अमिनी, लक्षद्वीप) ने आरोपी को दोषी मानते हुए अदालत उठने तक की सजा और ₹6 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया था।
बाद में आरोपी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उसने बिना पूरी कानूनी समझ के दोष स्वीकार कर लिया था और मजिस्ट्रेट ने प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
न्यायमूर्ति सी.एस. डायस ने मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट की रिपोर्ट और रिकॉर्ड का विस्तार से अध्ययन किया।
अदालत ने पाया कि आरोपी को अपराध के सभी विवरण समझाए गए थे और उसने स्वेच्छा से दोष स्वीकार किया।
कोर्ट ने कहा,
“रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि आरोपी को आरोपों की जानकारी दी गई और उसने स्वयं अपराध स्वीकार किया, जिसे विधिसम्मत तरीके से दर्ज किया गया।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि आरोपी ने सजा भी भुगत ली थी और लंबे समय तक कोई आपत्ति नहीं उठाई।
न्यायालय ने टिप्पणी की कि आरोपी एक शिक्षित व्यक्ति है और यह दावा कि उसे अपने स्वीकारोक्ति के परिणाम समझ नहीं आए, “विश्वसनीय नहीं” है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि समन मामलों (summons cases) में औपचारिक आरोप तय करना आवश्यक नहीं होता। कानून के तहत आरोपी को केवल आरोप समझाना और उसका जवाब लेना पर्याप्त है।
अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने सभी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया और इसमें कोई कानूनी त्रुटि या अनियमितता नहीं थी।
अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई मेरिट नहीं है और यह केवल मुआवजा देने से बचने का प्रयास प्रतीत होता है।
“इस न्यायालय को ऐसा कोई आधार नहीं मिलता जिससे ट्रायल कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप किया जाए,” अदालत ने कहा।
इसी के साथ, अदालत ने आरोपी की याचिका खारिज कर दी।
Case Details:
Case Title: Yahya Khan N vs Sainaba T.P. & Anr.
Case Number: CRL.MC No. 10511 of 2025
Judge: Justice C.S. Dias
Decision Date: 16 February 2026










