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दिव्यांग प्रमाणपत्र के दुरुपयोग पर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त, भर्ती में पुनः मेडिकल जांच का अधिकार सरकार को

रामप्रकाश खरलवा बनाम राजस्थान राज्य और संबंधित मामले, दिव्यांग आरक्षण भर्ती मामलों में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, फर्जी या संदिग्ध दिव्यांग प्रमाणपत्र पर पुनः मेडिकल जांच का अधिकार सरकार को।

Vivek G.
दिव्यांग प्रमाणपत्र के दुरुपयोग पर राजस्थान हाईकोर्ट सख्त, भर्ती में पुनः मेडिकल जांच का अधिकार सरकार को

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने दिव्यांग आरक्षण से जुड़ी भर्ती विवादों के एक बड़े समूह मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी उम्मीदवार ने दिव्यांगता का गलत या फर्जी प्रमाणपत्र देकर नौकरी हासिल की है तो उसे कानून का संरक्षण नहीं मिल सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार और भर्ती एजेंसियों को यह अधिकार है कि वे किसी भी उम्मीदवार की दिव्यांगता का पुनः मूल्यांकन (reassessment) करा सकें।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला राजस्थान में विभिन्न सरकारी भर्तियों से जुड़े कई उम्मीदवारों की याचिकाओं से जुड़ा था। इन याचिकाओं में मुख्य रूप से यह चुनौती दी गई थी कि भर्ती एजेंसियों और राज्य सरकार द्वारा उम्मीदवारों की दिव्यांगता की दोबारा मेडिकल जांच कराई जा रही है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनके पास पहले से जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र मौजूद है, इसलिए पुनः जांच कराने की आवश्यकता नहीं है।

दूसरी ओर राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि आरक्षण का लाभ केवल वांछित व्यक्तियों को मिल सकता है जिनके बेंचमार्क विकलांगता कानून के अनुसार प्रमाणित हो। इसलिए यदि किसी प्रमाणपत्र पर संदेह है तो उसका पुनर्मूल्यांकन जरूरी है।

अदालत की अहम टिप्पणियां

न्यायमूर्ति अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि दिव्यांग आरक्षण का उद्देश्य वास्तविक दिव्यांग व्यक्तियों को अवसर देना है।

पीठ ने कहा: “यदि कोई व्यक्ति गलत या फर्जी दिव्यांगता प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी प्राप्त करता है, तो उसे कानून का कोई संरक्षण नहीं मिल सकता।”

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दिव्यांगता का प्रमाणपत्र केवल वही मेडिकल प्राधिकरण जारी कर सकता है जिसे RPwD Act, 2016 के तहत अधिकृत किया गया हो।

पीठ ने कहा कि यदि कोई प्रमाणपत्र अधिकृत प्राधिकारी द्वारा जारी नहीं किया गया है, तो वह कानूनी रूप से मान्य नहीं माना जाएगा।

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पुनः मेडिकल जांच पर कोर्ट का रुख

अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार या भर्ती एजेंसियां उम्मीदवारों की दिव्यांगता का assessment या reassessment करा सकती हैं।

निर्णय में कहा गया कि:

  • दिव्यांगता का मूल्यांकन केवल RPwD Act के अध्याय-10 के अनुसार होना चाहिए।
  • मेडिकल बोर्ड या अधिकारी तभी प्रमाणपत्र जारी कर सकते हैं जब वे अधिकृत हों।
  • भर्ती एजेंसियां किसी भी उम्मीदवार को दोबारा मेडिकल जांच के लिए भेज सकती हैं।

फर्जी प्रमाणपत्र पर कार्रवाई की अनुमति

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पुनः जांच में यह पाया जाता है कि उम्मीदवार के पास benchmark disability नहीं है, तो सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।

अदालत ने यह भी कहा कि नौकरी गलत तरीके से प्राप्त करने वाले व्यक्ति को पद पर बने रहने का अधिकार नहीं है।

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अदालत का अंतिम निर्णय

सभी याचिकाओं का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि:

  • उम्मीदवार दिव्यांगता के पुनर्मूल्यांकन को चुनौती नहीं दे सकते।
  • राज्य सरकार और भर्ती एजेंसियों को पुनः मेडिकल जांच कराने का अधिकार है।
  • केवल अधिकृत प्राधिकारी द्वारा जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र ही मान्य होगा।
  • यदि पुनः जांच में दिव्यांगता मानकों के अनुरूप नहीं पाई जाती, तो संबंधित विभाग कार्रवाई कर सकता है।

अदालत ने यह भी आदेश दिया कि याचिकाकर्ताओं को पहले मिली किसी भी अंतरिम राहत को वापस लिया जाता है और सभी याचिकाएं निपटा दी जाती हैं।

Case Title: Ramprakash Kharlwa vs State of Rajasthan & Connected Matters

Case No.: S.B. Civil Writ Petition No. 15370/2025 & batch matters

Decision Date: 01 March 2026

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