मेन्यू
समाचार खोजें...
होमSaved

सुप्रीम कोर्ट: अधूरे सबूतों के कारण 2010 के हत्या मामले में पूरनमल को बरी कर दिया गया।

पूरणमल बनाम राजस्थान राज्य और अन्य - सुप्रीम कोर्ट ने अपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य और अस्वीकार्य कॉल डिटेल रिकॉर्ड का हवाला देते हुए 2010 के राजस्थान हत्याकांड मामले में पूरनमल को बरी कर दिया।

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट: अधूरे सबूतों के कारण 2010 के हत्या मामले में पूरनमल को बरी कर दिया गया।

लगभग 16 साल पुराने हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी पूरणमल को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी पक्की श्रृंखला स्थापित करने में नाकाम रहा जो आरोपी की दोष सिद्धि की ओर स्पष्ट रूप से इशारा करे।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड, बरामदगी और फॉरेंसिक रिपोर्ट जैसे साक्ष्य तब तक भरोसेमंद नहीं माने जा सकते जब तक उनकी वैधानिक प्रक्रिया और प्रमाणिकता पूरी तरह सिद्ध न हो।

Read also:- फर्जी बोर्ड के मैट्रिक प्रमाणपत्र पर मिली नौकरी रद्द करना सही: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला राजस्थान के भीलवाड़ा जिले से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, 2 और 3 मार्च 2010 की रात लाडू लाल की पत्नी अरुणा की उनके ही घर में हत्या कर दी गई थी।

घटना की रिपोर्ट खुद लाडू लाल ने पुलिस में दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि जब वह रात में उठे तो उनका कमरा बाहर से बंद था और उनकी पत्नी दूसरे कमरे में मृत अवस्था में पड़ी थीं। कमरे में संघर्ष के निशान थे और अलमारी से लगभग चार लाख रुपये गायब बताए गए।

जांच के दौरान पुलिस को संदेह लाडू लाल पर हुआ और उसके कथित बयान के आधार पर पूरणमल को भी आरोपी बनाया गया। पुलिस ने पूरणमल से एक खून से सना शर्ट और 46 हजार रुपये बरामद करने का दावा किया।

ट्रायल कोर्ट ने 2012 में पूरणमल और सह-आरोपी लाडू लाल को हत्या और सबूत मिटाने के अपराध में दोषी ठहराया। दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

इसके बाद दोनों आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की, लेकिन 2018 में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

हालांकि, पूरणमल आर्थिक तंगी के कारण समय पर सुप्रीम कोर्ट नहीं पहुंच सके और बाद में विधिक सहायता के माध्यम से अपील दाखिल की।

Read also:- सुप्रीम कोर्ट ने नेहा सिंह राठौर को अग्रिम जमानत दी, पीएम मोदी व पहलगाम हमले पर पोस्ट मामले में राहत

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

1. नकदी बरामदगी पर संदेह

अदालत ने कहा कि बरामद नकदी को लेकर ही संदेह पैदा हो जाता है। पुलिस ने 46,000 रुपये बरामद होने का दावा किया था, लेकिन अदालत में नोट गिने जाने पर रकम 46,145 रुपये निकली।

न्यायालय ने कहा कि ऐसी विसंगतियां बरामदगी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती हैं।

पीठ ने कहा,

“सिर्फ पैसे की बरामदगी, बिना किसी ठोस कड़ी के, आरोपी के खिलाफ दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

2. खून से सने शर्ट की बरामदगी अविश्वसनीय

अभियोजन ने दावा किया था कि आरोपी के घर से मिला शर्ट खून से सना था और फॉरेंसिक जांच में उसका रक्त समूह मृतका से मेल खाता था।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटना के बाद आरोपी कई दिनों तक स्वतंत्र था, ऐसे में यह अस्वाभाविक लगता है कि वह खून लगा शर्ट घर में ही छिपाकर रखे।

अदालत ने कहा कि इस परिस्थिति में शर्ट को नष्ट करना या धो देना कहीं अधिक संभावित व्यवहार होता। इसलिए बरामदगी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

3. फॉरेंसिक रिपोर्ट पर भी सवाल

पीठ ने पाया कि जब्त वस्तुओं की चेन ऑफ कस्टडी यानी जब्ती से लेकर फॉरेंसिक लैब तक सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं।

अदालत ने कहा कि यदि यह साबित नहीं हो कि सैंपल पूरे समय सुरक्षित और सीलबंद रहे, तो फॉरेंसिक रिपोर्ट की विश्वसनीयता कमजोर हो जाती है।

Read also:- मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विजयपुर उपचुनाव चुनौती खारिज की, आपराधिक मामलों के खुलासे पर याचिका नहीं मानी

4. कॉल डिटेल रिकॉर्ड भी स्वीकार्य नहीं

अभियोजन ने यह भी कहा था कि आरोपी और सह-आरोपी घटना के समय लगातार संपर्क में थे।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B के तहत प्रमाणपत्र जरूरी होता है।

पीठ ने कहा,

“जब तक धारा 65-B का अनिवार्य प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया जाता, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

Read also:- अरावली की परिभाषा तय करने की तैयारी: सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति बनाने की प्रक्रिया तेज की, यथास्थिति बरकरार

सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी और मजबूत श्रृंखला स्थापित नहीं कर पाया।

पीठ ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य आरोपी की दोष सिद्धि की ओर स्पष्ट रूप से इशारा नहीं करते।

अदालत ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए पूरणमल को आरोपों से बरी कर दिया और निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

Case Details

  • Case Title: Pooranmal vs State of Rajasthan & Another
  • Case No.: Criminal Appeal arising out of SLP (Crl.) No. 1977 of 2026
  • Decision Date: 10 March 2026

More Stories