दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार (12 जून) को सकेत कोर्ट के एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के खिलाफ कथित सोशल मीडिया ट्रोलिंग के मामले में स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने से इनकार कर दिया। यह ट्रोलिंग उस आदेश के बाद सामने आई थी, जिसमें न्यायाधीश ने राजनीतिक टिप्पणीकार अभिजीत अय्यर-मित्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश पर रोक लगा दी थी।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई असाधारण मामला नहीं बनता, जिसमें हाईकोर्ट को स्वयं हस्तक्षेप करना पड़े।
मामले की पृष्ठभूमि
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता पर्सिवल बिलिमोरिया ने अदालत को बताया कि संबंधित न्यायिक अधिकारी को सोशल मीडिया पर समन्वित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है। उनके अनुसार, कुछ पोस्टों में न्यायाधीश को “pathetic judge” कहा गया और न्यायपालिका को “rotten institution” बताया गया।
बिलिमोरिया ने कहा कि न्यायाधीश के आदेश से जुड़ी एक मीडिया रिपोर्ट को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किया गया, जिसके बाद उनके खिलाफ ऑनलाइन टिप्पणियों का सिलसिला शुरू हो गया।
यह विवाद उस मामले से जुड़ा है जिसमें न्यूज़लॉन्ड्री की संपादकीय निदेशक मनीषा पांडे और अन्य पत्रकारों ने अभिजीत अय्यर-मित्रा के सोशल मीडिया पोस्टों को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी। मजिस्ट्रेट अदालत ने एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था, जिसे बाद में सकेत कोर्ट ने स्थगित कर दिया।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्णा ने कहा कि न्यायिक आदेशों की आलोचना नई बात नहीं है और अदालतों को ऐसे मामलों में सावधानी से कदम उठाना चाहिए।
अदालत ने टिप्पणी की, “जब वकील अदालत के गलियारे में खड़े होते हैं, तो क्या ऐसी बातें आम बातचीत का हिस्सा नहीं होतीं? जब किसी के पक्ष में आदेश नहीं आता, तो लोग कहते हैं कि इस व्यक्ति को जज किसने बना दिया।”
साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को लगता है कि टिप्पणियां न्याय प्रशासन में बाधा डाल रही हैं, तो अवमानना कानून के तहत उपलब्ध उपायों का सहारा लिया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेने से इनकार करते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी विशेष या असाधारण कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने कहा, “मुझे आज ऐसा कोई मामला नहीं दिखता जिसमें मैं स्वतः संज्ञान लूं। यदि कोई उचित कार्यवाही सामने आती है, तो उसे कानून के अनुसार देखा जा सकता है। फिलहाल मैं स्वतः संज्ञान लेने के पक्ष में नहीं हूं।”
इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि संबंधित न्यायिक अधिकारी उचित समझें, तो अवमानना कार्यवाही के लिए उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया का सहारा ले सकते हैं।

