इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मई 2026 में लखनऊ के अधिवक्ताओं द्वारा किए गए न्यायिक कार्य के बहिष्कार और हड़ताल को "अवैध" और "अनुचित" करार दिया है। अदालत ने इस मामले में सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ और लखनऊ बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों सहित कुछ अधिवक्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।
यह आदेश न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति राजीव भारती की खंडपीठ ने 8 जून 2026 को पारित किया।
यह मामला लखनऊ के चकबस्त चौराहे के पास कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई से जुड़ी जनहित याचिका के दौरान सामने आया। सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष जिला जज, लखनऊ की रिपोर्ट, तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्डिंग प्रस्तुत की गईं।
रिपोर्ट में बताया गया कि सेंट्रल बार एसोसिएशन और लखनऊ बार एसोसिएशन के आह्वान पर 18 मई से 26 मई 2026 तक अधिवक्ताओं ने न्यायिक कार्य से विरत रहते हुए हड़ताल की। इसके कारण अदालतों का कामकाज प्रभावित हुआ और कई मुकदमों की सुनवाई नहीं हो सकी।
खंडपीठ ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें हरिश उप्पल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, कृष्णकांत ताम्रकार बनाम मध्य प्रदेश राज्य और डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन, देहरादून बनाम ईश्वर शांडिल्य शामिल हैं।
अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि अधिवक्ताओं को हड़ताल करने या न्यायिक कार्य का बहिष्कार करने का कोई अधिकार नहीं है। उत्तर प्रदेश में भी इस संबंध में पहले ही निर्देश जारी किए जा चुके हैं और सभी बार एसोसिएशनों को इसकी जानकारी दी जा चुकी थी।
अदालत ने कहा कि हड़ताल का सीधा असर उन वादकारियों और गवाहों पर पड़ा जो सुनवाई के लिए अदालत पहुंचे थे। कई लोगों को आर्थिक और अन्य प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ा।
खंडपीठ ने कहा,
"अधिवक्ताओं का यह आचरण न केवल अनुचित है बल्कि अवैध भी है।"
अदालत ने यह भी कहा कि न्याय तक शीघ्र पहुंच नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और किसी भी प्रकार की हड़ताल या बहिष्कार उस अधिकार को प्रभावित नहीं कर सकता।
सुनवाई के दौरान अदालत के संज्ञान में यह भी लाया गया कि एक बैठक में कुछ अधिवक्ताओं के बीच प्लास्टिक की लाठियां वितरित की गईं। साथ ही कुछ कथित भाषणों और सोशल मीडिया पोस्टों का भी उल्लेख किया गया, जिनकी जांच की जा रही है।
अदालत ने नोट किया कि सेंट्रल बार एसोसिएशन ने दो अधिवक्ताओं के खिलाफ आंतरिक कार्रवाई करते हुए उन्हें पांच वर्ष के लिए प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया है।
इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने फिलहाल सीधे आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के बजाय संबंधित पक्षों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्णय लिया।
नोटिस सेंट्रल बार एसोसिएशन और लखनऊ बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों के अलावा तीन अधिवक्ताओं को भी जारी किए गए हैं। उनसे पूछा गया है कि उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए और उनके कथित आचरण को बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को क्यों न भेजा जाए।
अदालत ने संबंधित अधिवक्ताओं को दो सप्ताह के भीतर शपथपत्र सहित अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। उन्हें यह आश्वासन भी देना होगा कि वे भविष्य में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून का पालन करेंगे और पेशे की गरिमा बनाए रखेंगे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 18 मई से 26 मई 2026 तक चली अधिवक्ताओं की हड़ताल और न्यायिक कार्य के बहिष्कार को अवैध और अनुचित घोषित करते हुए संबंधित बार पदाधिकारियों और अधिवक्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अदालत ने कहा कि उनके जवाब और प्रस्तुत किए जाने वाले शपथपत्रों पर विचार करने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
मामले की अगली सुनवाई 27 जुलाई 2026 को निर्धारित की गई है।
Case Details
Case Title: Anuradha Singh and Others v. State of U.P. Through Principal Secretary Home and Others
Case Number: Criminal Writ-Public Interest Litigation No. 4 of 2026
Judge: Justice Rajesh Singh Chauhan and Justice Rajeev Bharti
Decision Date: June 8, 2026

