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'यूट्यूब कोर्ट नहीं है': सुप्रीम कोर्ट ने केरल के पत्रकार को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोषी या निर्दोष तय करना कोर्ट का काम है, यूट्यूब का नहीं। महिला नेता पर आपत्तिजनक वीडियो डालने पर पत्रकार को फटकार।

Vivek G.
'यूट्यूब कोर्ट नहीं है': सुप्रीम कोर्ट ने केरल के पत्रकार को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने हाल ही में पत्रकार नंदकुमार टी.पी. की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सोशल मीडिया के ज़रिए न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास पर कड़ी टिप्पणी की। नंदकुमार “क्राइम ऑनलाइन” नामक यूट्यूब चैनल चलाते हैं, और उन पर एक प्रमुख महिला राजनेता के खिलाफ आपत्तिजनक और अश्लील वीडियो पोस्ट करने का आरोप है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई।

“किस पब्लिक डिस्कशन की बात हो रही है? दोषी या निर्दोष तय करने का काम कोर्ट का है। यूट्यूब प्रेजेंटेशन कोर्ट की जगह नहीं ले सकता,” न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा।

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याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि वीडियो में केवल 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए बयानों का संदर्भ दिया गया है और याचिकाकर्ता ने कोई नया आरोप नहीं लगाया।

इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने दो टूक कहा:

“क्या आप यूट्यूब वीडियो के आधार पर लोगों को दोषी ठहराना चाहते हैं? दोषसिद्धि या बरी होने का निर्णय यूट्यूब से नहीं होता, वो कोर्ट करता है।”

न्यायालय ने यह भी सवाल उठाया कि इस तरह की सामग्री यूट्यूब पर क्यों डाली जा रही है:

“यूट्यूब का इस्तेमाल आखिर किस लिए किया जा रहा है! कुछ अच्छा कहिए यूट्यूब पर। ये क्राइम ऑनलाइन वगैरह क्यों? केरल में कुछ अच्छा हो रहा है, God's own country है, उसके बारे में बात कीजिए।”

उन्होंने आगे पूछा:

“यूट्यूब पर यह सब क्यों बोलना चाहते हैं आप? आखिर पार्टी ऐसा सब क्यों कर रही है?”

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जब वकील ने कहा कि वीडियो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का हिस्सा था, तो कोर्ट ने कहा:

“इस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ी जाती।”

नंदकुमार टी.पी. पर एक महिला राजनेता के खिलाफ यौन टिप्पणी, अपमानजनक और धमकीभरे बयान देने के आरोप में मुकदमा चल रहा है। दर्ज प्राथमिकी में उनके खिलाफ निम्नलिखित धाराएं लगाई गई हैं:

धारा 75(1)(iv) – महिला की मर्यादा का अपमान

धारा 79 – धमकी देना और मानहानि की मंशा

धारा 351(1)(2) – अश्लील सामग्री का इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से प्रसार

आईटी अधिनियम की धारा 67 – इलेक्ट्रॉनिक रूप से अश्लील सामग्री का प्रकाशन या प्रसारण

केरल उच्च न्यायालय ने 9 जून 2025 के आदेश में उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए उन्हें पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण का निर्देश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए नंदकुमार सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

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18 जून 2025 को अवकाशकालीन पीठ ने उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम राहत प्रदान की। कोर्ट ने कहा कि यदि उन्हें गिरफ्तार किया जाता है, तो जांच अधिकारी की संतुष्टि के अनुसार जमानत और बॉन्ड देने पर ट्रायल कोर्ट उन्हें रिहा कर देगा। साथ ही, उन्हें जांच में सहयोग करने को कहा गया।

राज्य सरकार ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, जिसके बाद कोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह के लिए स्थगित कर दी।

इस मामले ने एक बार फिर न्यायपालिका की उस चिंता को उजागर किया है जो वह सोशल मीडिया के अनियंत्रित उपयोग को लेकर लगातार जता रही है। सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश

“यूट्यूब कोर्ट की जगह नहीं ले सकता”यह याद दिलाता है कि न्याय केवल संविधान और विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के तहत ही दिया जा सकता है, न कि सोशल मीडिया ट्रायल से।

मामला शीर्षक: नंदकुमार टी.पी. बनाम राज्य केरल एवं अन्यमामला संख्या: SLP(Crl) No. 9098/2025

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