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सुप्रीम कोर्ट ने AP, दिल्ली और J&K के मुख्य सचिवों को भ्रामक मेडिकल विज्ञापनों पर निष्क्रियता का कारण बताने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों को भ्रामक मेडिकल विज्ञापनों पर कार्रवाई न करने के लिए तलब किया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार के ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 के नियम 170 को हटाने के आदेश को भी रोक दिया है।

Shivam Y.
सुप्रीम कोर्ट ने AP, दिल्ली और J&K के मुख्य सचिवों को भ्रामक मेडिकल विज्ञापनों पर निष्क्रियता का कारण बताने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों को 7 मार्च 2025 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने का निर्देश दिया है। अदालत ने इन राज्यों से यह स्पष्टीकरण मांगा है कि उन्होंने भ्रामक मेडिकल विज्ञापनों पर रोक लगाने के लिए पहले दिए गए आदेशों का पालन क्यों नहीं किया।

"आंध्र प्रदेश, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों के मामले में, हमें लगता है कि हमारे आदेशों का पालन करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया है... बार-बार आदेश देने के बावजूद ये राज्य अनुपालन नहीं कर रहे हैं।"– न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और उज्जल भूइयां की पीठ

कोर्ट ने इन राज्यों को इस महीने के अंत तक हलफनामा दाखिल करने का समय दिया है, जिसमें भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई के विवरण देने होंगे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें आयुर्वेदिक, सिद्धा और यूनानी (ASU) दवाओं के भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

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नियम 170 क्या है?

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945 का नियम 170 बिना लाइसेंसिंग प्राधिकरण की अनुमति के किसी भी ASU दवा के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाता है।

लेकिन 29 अगस्त 2023 को, आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) ने एक आदेश जारी कर राज्यों को नियम 170 लागू न करने का निर्देश दिया। इस आदेश को आयुर्वेदिक, सिद्धा और यूनानी ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (ASUDTAB) की सिफारिश के आधार पर जारी किया गया था।

7 मई 2024 को, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस आदेश पर स्पष्टीकरण मांगा। सरकार ने इस आदेश को तुरंत वापस लेने का वादा किया था। लेकिन इसके बजाय 1 जुलाई 2024 को एक अधिसूचना जारी की गई, जिसमें नियम 170 को हटाने की घोषणा की गई।

कोर्ट ने इसे मई 2024 के आदेश का उल्लंघन माना और सरकार के इस फैसले पर रोक लगा दी।

"जब तक आगे कोई आदेश नहीं आता, 1 जुलाई 2024 की अधिसूचना का प्रभाव स्थगित रहेगा। यानी नियम 170 अभी भी लागू रहेगा।"– सुप्रीम कोर्ट

वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत (Amicus Curiae) का तर्क

कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने कहा कि यदि सभी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश नियम 170 को पूरी तरह से लागू करें, तो यह समस्या काफी हद तक हल हो जाएगी।

"नियम 170 का सख्ती से पालन ही इस पूरे मुद्दे का समाधान है।"– शादान फरासत

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सुप्रीम कोर्ट ने पहले सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) को यह रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था कि उन्होंने भ्रामक मेडिकल विज्ञापनों के खिलाफ क्या कार्रवाई की है।

यह आदेश निम्नलिखित कानूनों के तहत कार्रवाई की निगरानी के लिए दिया गया था:

ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954

ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019

लेकिन आंध्र प्रदेश, दिल्ली, गोवा, गुजरात और जम्मू-कश्मीर ने इस आदेश का पालन नहीं किया, जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट को मुख्य सचिवों को तलब करना पड़ा।

न्यायमूर्ति ओका का बयान: अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए यह सबसे प्रभावी तरीका

"हमारा अनुभव बताता है कि जब हम मुख्य सचिवों को तलब करते हैं, तो चीजें तेजी से आगे बढ़ती हैं। हम उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में नहीं बुला रहे हैं, लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो हम ऐसा भी कर सकते हैं।"– न्यायमूर्ति अभय एस. ओका

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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के खिलाफ भी अवमानना कार्यवाही चलाई, क्योंकि कंपनी ने अदालत के निर्देशों का उल्लंघन करते हुए भ्रामक विज्ञापन जारी रखे।

पतंजलि की माफी और अदालत का फैसला

जब सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई की चेतावनी दी, तो पतंजलि, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी।

"हम कोर्ट के आदेशों का पूरा सम्मान करते हैं और भविष्य में इस तरह की गलती नहीं होगी।"– पतंजलि आयुर्वेद

13 अगस्त 2024 को, कोर्ट ने पतंजलि और इसके संस्थापकों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही समाप्त कर दी।

IMA अध्यक्ष डॉ. आर. वी. असोकन पर अवमानना कार्यवाही

IMA अध्यक्ष डॉ. आर. वी. असोकन को भी सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ आलोचनात्मक बयान देने के लिए अवमानना का सामना करना पड़ा।

कोर्ट ने 27 अगस्त 2024 को द हिंदू अखबार में माफीनामा प्रकाशित करने का निर्देश दिया, लेकिन अखबार में प्रकाशित माफी की आकार और प्रस्तुति से असंतुष्ट होकर कोर्ट ने इसे दोबारा प्रकाशित करने का आदेश दिया।

बाद में, IMA अध्यक्ष की माफी स्वीकार कर कोर्ट ने उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही भी समाप्त कर दी।

मामले का शीर्षक: इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम भारत सरकार, W.P.(C) No. 645/2022

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