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सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर आदेश में संशोधन किया: जनता की सुरक्षा और पशु कल्याण में संतुलन

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों पर आदेश में संशोधन किया। नया आदेश सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन लाता है।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों पर आदेश में संशोधन किया: जनता की सुरक्षा और पशु कल्याण में संतुलन

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में आवारा कुत्तों को लेकर दिए अपने पहले के आदेश में संशोधन किया है। यह मामला तब शुरू हुआ जब कोर्ट ने टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट “सिटी हाउंडेड बाय स्ट्रेज, किड्स पे प्राइस” पर सुओ मोटो संज्ञान लिया। इस रिपोर्ट में छह साल की बच्ची की मौत का ज़िक्र था, जो कुत्ते के काटने के बाद रेबीज़ से मर गई।

मामले की पृष्ठभूमि

28 जुलाई 2025 को कोर्ट ने मामले की सुनवाई शुरू की और बढ़ते कुत्ता काटने के मामलों और सार्वजनिक सुरक्षा को देखते हुए चिंता जताई। 11 अगस्त 2025 को दिए आदेश में कोर्ट ने दिल्ली, गाज़ियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद की सभी प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि आवारा कुत्तों को पकड़कर नसबंदी, टीकाकरण किया जाए और उन्हें शेल्टर होम में रखा जाए। साथ ही, इन कुत्तों को सड़कों पर वापस न छोड़ा जाए। आदेश में यह भी कहा गया था कि अगर अधिकारी लापरवाही करेंगे तो सख्त कार्रवाई होगी।

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हालांकि, कई एनजीओ और पशु कल्याण कार्यकर्ताओं ने इस आदेश को चुनौती दी। उनका कहना था कि यह आदेश एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम, 2023 का उल्लंघन है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को उसी इलाके में वापस छोड़ा जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी आशंका जताई कि जगह और संसाधनों की कमी के कारण कई कुत्तों को मारा जा सकता है।

पशु कल्याण समूहों ने कहा कि सभी कुत्तों को शेल्टर में रखना असंभव है, क्योंकि जगह और संसाधन सीमित हैं।

उन्होंने आशंका जताई कि आदेश के पालन के नाम पर कई कुत्ते और पिल्ले मारे जा सकते हैं।

उनका यह भी कहना था कि आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वालों को परेशान किया जा रहा है और यह उनके अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

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वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए, ने बताया कि साल 2024 में भारत में 37 लाख से ज्यादा कुत्ता काटने के मामले दर्ज हुए। उन्होंने कहा कि सिर्फ नसबंदी से हमलों को रोका नहीं जा सकता और बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए तुरंत कदम ज़रूरी हैं।

“यह आदेश नागरिकों के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार की रक्षा के लिए आवश्यक अस्थायी कदम हैं,” सॉलिसिटर जनरल ने कहा।

सभी पक्षों को सुनने के बाद, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजरिया की तीन जजों की पीठ ने 22 अगस्त 2025 को संशोधित दिशानिर्देश जारी किए:

नगर निगम और प्राधिकरण आवारा कुत्तों की पकड़, नसबंदी और टीकाकरण जारी रखें।

नसबंदी और टीकाकरण के बाद कुत्तों को वापस उनके इलाकों में छोड़ा जाए, लेकिन आक्रामक या रेबीज़ से संक्रमित कुत्तों को शेल्टर में ही रखा जाएगा।

हर वार्ड में फीडिंग ज़ोन बनाए जाएं, और सड़कों पर खाना खिलाना मना होगा।

आदेश के पालन में बाधा डालने वाले एनजीओ या व्यक्ति पर कार्रवाई होगी।

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जो एनजीओ और पशु प्रेमी कोर्ट पहुंचे हैं, उन्हें क्रमशः ₹25,000 और ₹2 लाख जमा करने होंगे। यह राशि कुत्तों के लिए ढांचा और सुविधाएं बनाने में खर्च होगी।

इच्छुक नागरिक नगर निगम से प्रक्रिया के तहत कुत्ते गोद ले सकते हैं, और सुनिश्चित करना होगा कि वह कुत्ता दोबारा सड़क पर न आए।

यह मामला अब देशभर में विस्तारित कर दिया गया है। सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को ABC नियम, 2023 के पालन की रिपोर्ट आठ हफ्तों में दाखिल करनी होगी।

केस का शीर्षक: "आवारा कुत्तों से परेशान शहर, बच्चों ने चुकाई कीमत"

केस का प्रकार: स्वप्रेरणा से दायर रिट याचिका (सिविल) संख्या 5/2025, साथ ही संबंधित रिट याचिका (सिविल) संख्या 784/2025, विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 14763/2024, और विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 17623/2025।

आदेश की तिथि: 22 अगस्त 2025

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