सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता यतीन नरेंद्र ओझा से जुड़े आपराधिक अवमानना मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि ओझा द्वारा हाईकोर्ट को “जुए का अड्डा” कहना अनुचित और अस्वीकार्य था, लेकिन उनके द्वारा बार-बार मांगी गई बिना शर्त माफी, कोविड काल की परिस्थितियां और पहले से झेला गया पेशेवर नुकसान भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद जून 2020 में शुरू हुआ था, जब कोविड महामारी के दौरान यतीन ओझा ने एक लाइव प्रेस कॉन्फ्रेंस में गुजरात हाईकोर्ट की रजिस्ट्री और न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा था कि अदालत में अमीर और प्रभावशाली लोगों के मामलों को प्राथमिकता दी जा रही है जबकि सामान्य वकीलों और गरीब पक्षकारों की सुनवाई प्रभावित हो रही है। इसी दौरान उन्होंने हाईकोर्ट को “गैम्बलिंग डेन” यानी “जुए का अड्डा” कह दिया था।
इसके बाद गुजरात हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की। बाद में फुल कोर्ट ने उनकी वरिष्ठ अधिवक्ता की उपाधि भी वापस ले ली थी।
ओझा की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि महामारी के दौरान युवा वकीलों की परेशानियों को लेकर वे लगातार दबाव में थे। उनका कहना था कि विवादित बयान किसी पूर्व योजना का हिस्सा नहीं था बल्कि भावनात्मक प्रतिक्रिया थी। उन्होंने अदालत के प्रति सम्मान जताते हुए कई बार बिना शर्त माफी भी मांगी।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष ओझा ने यह भी कहा कि उन्हें अपने शब्दों पर गहरा पछतावा है और उन्होंने भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न करने का आश्वासन दिया।
न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी की पीठ ने कहा कि न्यायपालिका और बार, न्याय व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं और दोनों के बीच टकराव से आम लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है। अदालत ने माना कि ओझा की भाषा “अस्वीकार्य” थी और वरिष्ठ अधिवक्ता होने के नाते उनसे अधिक संयम की अपेक्षा थी।
हालांकि, अदालत ने यह भी नोट किया कि ओझा पहले ही लगभग डेढ़ साल तक वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा खो चुके थे, जिससे उन्हें पेशेवर और सामाजिक स्तर पर भारी नुकसान हुआ। फैसले में कहा गया,
“अदालत इस तथ्य से आंखें नहीं मूंद सकती कि एक ही घटना के कारण अपीलकर्ता को गंभीर पेशेवर और व्यक्तिगत कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।”
पीठ ने यह भी दर्ज किया कि ओझा ने शुरुआत से ही माफी मांगते हुए कहा था कि उनका उद्देश्य अदालत की गरिमा कम करना नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि गुजरात हाईकोर्ट द्वारा अवमानना और वरिष्ठ अधिवक्ता की उपाधि वापस लेने की कार्यवाही कानूनी रूप से अलग-अलग थीं। अदालत ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि ओझा का बयान न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला था।
फिर भी, अदालत ने ओझा की माफी, कोविड काल की असाधारण परिस्थितियों और पहले से झेली गई सजा को ध्यान में रखते हुए मामले को अंतिम रूप से निपटाने का निर्णय लिया।
Case Details:
Case Title: Yatin Narendra Oza v. Suo Motu, High Court of Gujarat and Another
Case Number: Criminal Appeal No. 669 of 2020
Judge: Justice J.K. Maheshwari
Decision Date: 11 May 2026











