इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि किसी बयान को अपराध मानने के लिए ठोस सामग्री और संदर्भ जरूरी हैं। कोर्ट ने कहा कि केवल संदेह या कल्पना के आधार पर आपराधिक कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती।
याचिकाकर्ता ने एक सांसद के बयान को आधार बनाते हुए FIR दर्ज करने की मांग की थी। आरोप था कि यह बयान देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ है और इससे समाज में अस्थिरता फैल सकती है। निचली अदालत और पुनरीक्षण अदालत दोनों ने पहले ही इस मांग को खारिज कर दिया था।
Read also:- Delhi Judicial Officer Found Dead at Green Park Residence, Police Probe Continues
सुनवाई के दौरान अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत हर नागरिक को बोलने और अपनी राय रखने का अधिकार है, हालांकि यह कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी भाषण को अपराध साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि वह वास्तव में विद्रोह, अलगाव या हिंसा को उकसाता है।
कोर्ट ने कहा,
“सिर्फ किसी बयान से असहमति या उसका अप्रिय होना, उसे अपराध नहीं बनाता जब तक कि वह कानून में निर्धारित तत्वों को पूरा न करे।”
साथ ही, अदालत ने यह भी नोट किया कि संबंधित बयान का पूरा संदर्भ रिकॉर्ड पर नहीं था और याचिकाकर्ता यह नहीं दिखा सके कि उससे किसी प्रकार का वास्तविक खतरा उत्पन्न हुआ।
अदालत ने माना कि FIR दर्ज करना एक गंभीर कदम है, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए, अदालतों को सावधानीपूर्वक यह जांचना चाहिए कि प्रथम दृष्टया (prima facie) कोई अपराध बनता है या नहीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में सरकार या नीतियों की आलोचना करना स्वाभाविक है और इसे स्वतः अपराध नहीं माना जा सकता।
अंत में, हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों के आदेशों में कोई गंभीर त्रुटि या अधिकार का दुरुपयोग नहीं है।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री प्रस्तुत करने में विफल रहे हैं।
इस आधार पर, अदालत ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।
Case Details
Case Title: Simran Gupta vs State of U.P. and Another
Case Number: Matters Under Article 227 No. 14562 of 2025
Judge: Justice Vikram D. Chauhan
Decision Date: 1 May 2026











