सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (22 अप्रैल 2026) को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर चल रही प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में कथित हस्तक्षेप को लेकर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह संवैधानिक व्यवस्था पर असर डाल सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला ED और उसके अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं से जुड़ा है, जो संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई हैं। एजेंसी ने मांग की है कि कोलकाता स्थित राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म I-PAC के दफ्तर पर की गई छापेमारी के दौरान कथित बाधा की जांच CBI से कराई जाए।
ED का आरोप है कि तलाशी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मौके पर पहुंचीं और कुछ दस्तावेज व इलेक्ट्रॉनिक उपकरण अपने साथ ले गईं, जो जांच के लिए महत्वपूर्ण थे। वहीं राज्य सरकार ने इन आरोपों से असहमति जताते हुए कहा कि कोई अवैध हस्तक्षेप नहीं हुआ।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने सुनवाई के दौरान इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए कहा कि इसे साधारण केंद्र-राज्य विवाद नहीं माना जा सकता।
पीठ ने कहा,
“यह केंद्र और राज्य के बीच का विवाद नहीं है। कोई भी मुख्यमंत्री जांच के बीच में जाकर उसे प्रभावित नहीं कर सकता।”
अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति असामान्य है।
“हमने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा दिन आएगा जब कोई मौजूदा मुख्यमंत्री जांच एजेंसी के दफ्तर में पहुंचकर हस्तक्षेप करेगा,” पीठ ने टिप्पणी की।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ऐसे आरोप सही हैं तो यह “लोकतंत्र को खतरे में डाल सकता है।”
राज्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने याचिका की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि यह मामला अनुच्छेद 131 के तहत केंद्र-राज्य विवाद के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि अनुच्छेद 32 के तहत।
हालांकि, अदालत इस तर्क से सहमत नहीं दिखी। पीठ ने पूछा कि इसमें राज्य का कौन-सा मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहा है और कहा कि मामला एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के कथित आचरण से जुड़ा है।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी तर्क दिया कि ED एक वैधानिक संस्था है और उसे अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों का दावा करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि जांच करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या सरकारी अधिकारी अपने पद पर रहते हुए मौलिक अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसा मान लेना न्यायिक उपचार के अधिकार को सीमित कर सकता है।
सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता भी उपस्थित रहे। अदालत ने संविधान पीठ को मामला भेजने की मांग को भी खारिज कर दिया और कहा कि हर कानूनी प्रश्न को बड़ी पीठ के पास भेजना जरूरी नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई जारी रखते हुए कहा कि इस मुद्दे की गहन जांच जरूरी है, क्योंकि यह जांच एजेंसियों के कामकाज और संवैधानिक व्यवस्था दोनों से जुड़ा है।
Case Details:
Case Title: Directorate of Enforcement v. State of West Bengal
Case Number: W.P.(Crl.) No. 16/2026
Bench: Justices Prashant Kumar Mishra and N. V. Anjaria
Decision Date: April 22, 2026










