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मां की मौत के बाद पिता ही प्राकृतिक अभिभावक: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 13 माह के बच्चे की कस्टडी सौंपी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मां की मौत के बाद 13 महीने के बच्चे की कस्टडी पिता को दी, कहा—पिता ही प्राकृतिक अभिभावक और बच्चे के हित में सबसे उपयुक्त। - अक्षत पांडे (नाबालिग) और एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 6 अन्य

Shivam Y.
मां की मौत के बाद पिता ही प्राकृतिक अभिभावक: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 13 माह के बच्चे की कस्टडी सौंपी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि मां के निधन के बाद पिता सामान्यतः बच्चे का प्राकृतिक और सबसे उपयुक्त अभिभावक होता है। अदालत ने 13 महीने के एक बच्चे की कस्टडी उसके पिता को सौंपते हुए हैबियस कॉर्पस याचिका मंजूर कर ली।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अक्षत पांडे (नाबालिग) और एक अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 6 अन्य से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता विपिन कुमार पांडेय ने अपने नाबालिग बेटे की कस्टडी मांगी थी।

रिकॉर्ड के अनुसार, बच्चे की मां दीपिका पांडेय का निधन 10 फरवरी 2025 को हो गया था। इसके बाद बच्चा अपने मामा-मौसी के पास रह रहा था। पिता ने अदालत में कहा कि वह आर्थिक रूप से सक्षम हैं और बच्चे की देखभाल कर सकते हैं।

वहीं, निजी प्रतिवादियों ने दलील दी कि बच्चा अभी बहुत छोटा है और विशेष देखभाल की जरूरत है, जो फिलहाल वे दे रहे हैं।

न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामलों में “बच्चे का सर्वोत्तम हित” सबसे महत्वपूर्ण होता है।

अदालत ने कहा,

“मां के निधन के बाद पिता प्राकृतिक अभिभावक होता है और सामान्य परिस्थितियों में वही बच्चे के हित में सबसे उपयुक्त होता है।”

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि IVF प्रक्रिया के दौरान मां की मृत्यु को पिता के खिलाफ नहीं माना जा सकता और इससे उनकी अभिभावकता पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।

अदालत ने पाया कि पिता के खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है और वह आर्थिक रूप से सक्षम हैं। साथ ही, उनकी बहन भी बच्चे की देखभाल में सहयोग के लिए उपलब्ध है।

पीठ ने यह भी कहा कि यदि इस उम्र में बच्चे को पिता से दूर रखा गया, तो भविष्य में उनके बीच भावनात्मक संबंध कमजोर हो सकता है।

अदालत ने सभी परिस्थितियों को देखते हुए याचिका स्वीकार कर ली और निर्देश दिया कि बच्चे की कस्टडी तुरंत पिता को सौंपी जाए।

साथ ही, अदालत ने बच्चे के ननिहाल पक्ष को हर रविवार दो घंटे मिलने का अधिकार (visitation rights) दिया, ताकि बच्चे का भावनात्मक संबंध दोनों परिवारों से बना रहे।

पीठ ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में बच्चे के हित के खिलाफ कोई स्थिति सामने आती है, तो संबंधित पक्ष अदालत का रुख कर सकते हैं।

Case Details:

Case Title: Akshit Pandey (Minor) and Another vs State of U.P. and 6 Others

Case Number: Habeas Corpus Writ Petition No. 365 of 2025

Judge: Justice Sandeep Jain

Decision Date: April 21, 2026

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