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सुप्रीम कोर्ट ने मुआवज़े में देरी पर विधवा की याचिका खारिज की, कहा- चेक बिना आपत्ति स्वीकार किया

सुप्रीम कोर्ट ने उर्मिला चंद की मोटर दुर्घटना मुआवज़ा मामले में अपील खारिज की, कहा उन्होंने हिस्सा जानते-बूझते स्वीकार किया।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने मुआवज़े में देरी पर विधवा की याचिका खारिज की, कहा- चेक बिना आपत्ति स्वीकार किया

हाल ही के एक फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने उर्मिला चंद की अपील को खारिज कर दिया। उन्होंने मोटर दुर्घटना मुआवज़े के बंटवारे को चुनौती दी थी। अदालत ने कहा कि उन्होंने अपनी हिस्सेदारी पहले ही जानते-बूझते स्वीकार कर ली थी, इसलिए बाद में धोखाधड़ी या अनुचितता का दावा नहीं कर सकतीं।

पृष्ठभूमि

यह मामला 2009 का है, जब प्रियंक चंद की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। दुर्घटना असम के तिनसुकिया के पास हुई, जहाँ एक ट्रक और कार की टक्कर हो गई थी। मृतक की माँ, पत्नी और दो नाबालिग बच्चों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (ट्रिब्यूनल) में मामला दायर किया। अधिकरण ने कुल ₹11.82 लाख का मुआवज़ा तय किया।

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2015 में ट्रिब्यूनल ने राशि का बंटवारा किया: ₹1 लाख उर्मिला चंद (माँ) को, ₹6.26 लाख बहू को और ₹3-3 लाख नाबालिग बच्चों के नाम स्थायी जमा (फिक्स्ड डिपॉज़िट) में रखे गए। उर्मिला ने आदेश पत्र पर हस्ताक्षर किए और चेक भी भुना लिया। लेकिन बाद में उन्होंने पुनर्विचार याचिका दाखिल कर कहा कि बंटवारा अनुचित था और उन्हें बड़ा हिस्सा मिलना चाहिए। ट्रिब्यूनल ने छह महीने से अधिक की देरी का हवाला देकर याचिका खारिज कर दी। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने 2021 में इस आदेश को बरकरार रखा।

अंतिम अपील सुनते हुए न्यायमूर्ति एन.वी. अंज़ारिया की पीठ ने कहा कि उर्मिला ने 2015 में स्वेच्छा से संयुक्त याचिका पर हस्ताक्षर किए थे और चेक लिया था, बिना कोई आपत्ति जताए। अदालत ने कहा, “जब याचिकाकर्ता ने आदेश पत्र पर हस्ताक्षर किया और ₹1 लाख का चेक लिया, तो यह माना जाएगा कि उन्हें आदेश की जानकारी थी।”

न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि स्वास्थ्य संबंधी दलीलें और वकीलों से असंतोष देरी का उचित कारण नहीं ठहराया जा सकता। हाई कोर्ट की पहले की यह टिप्पणी कि उनकी बाद की कार्रवाइयाँ “कहानी गढ़ने का एक बहाना” लगती हैं, सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया।

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फ़ैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उर्मिला चंद का व्यवहार दिखाता है कि उन्होंने अपनी हिस्सेदारी जानबूझकर स्वीकार की थी, और अब वे बाद में असहमति जता नहीं सकतीं। अदालत ने पाया कि उनके दावों में कोई दम नहीं है और 3 सितंबर 2025 को उनकी अपील खारिज कर दी गई। इसी के साथ लंबे समय से चल रहे मुक़दमे का अंत हुआ।

केस का शीर्षक: उर्मिला चंद बनाम सोनू चंद एवं अन्य

दिनांक: 3 सितंबर, 2025

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