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सुप्रीम कोर्ट ने बिहार POCSO मामले में बहाल की दोषसिद्धि, हाई कोर्ट को प्रक्रियात्मक त्रुटियों पर लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में एक नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में दो आरोपियों की दोषसिद्धि बहाल कर दी और पटना हाई कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि POCSO मामलों में प्रक्रियात्मक त्रुटियाँ न्याय से ऊपर नहीं हो सकतीं।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार POCSO मामले में बहाल की दोषसिद्धि, हाई कोर्ट को प्रक्रियात्मक त्रुटियों पर लगाई फटकार

यह मामला बिहार के भोजपुर ज़िले के पीरो से 2016 में सामने आया। अपीलकर्ता सुशील कुमार तिवारी की नाबालिग बेटी के साथ हरे राम साह और मनीष तिवारी ने बार-बार दुष्कर्म किया। पीड़िता गर्भवती हो गई और उसका इलाज उत्तर प्रदेश के बलिया स्थित ज़िला महिला चिकित्सालय में हुआ। जांच में गर्भ ठहरने की पुष्टि हुई। इसके बाद 2 जुलाई 2016 को एफआईआर दर्ज कराई गई।

ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए सज़ा सुनाई:

धारा 376(2) आईपीसी – आजीवन कारावास + ₹50,000 जुर्माना प्रत्येक

POCSO अधिनियम की धारा 6 – आजीवन कारावास + ₹25,000 जुर्माना प्रत्येक

POCSO अधिनियम की धारा 4 – 7 साल कारावास + ₹10,000 जुर्माना प्रत्येक(सभी सजाएँ साथ-साथ चलेंगी)।

बाद में पटना हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि रद्द कर दी और कहा कि:

घटना की सही तारीख और समय साबित नहीं हुआ।

पीड़िता की उम्र का स्पष्ट निर्धारण नहीं किया गया।

गर्भपात का प्रमाण प्रस्तुत नहीं हुआ।

आरोप तय करने में त्रुटि हुई।

धारा 223 दंप्रसं के तहत संयुक्त ट्रायल सही ढंग से नहीं हुआ।

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हाई कोर्ट ने माना कि इन खामियों से “न्याय का गर्भपात (miscarriage of justice)” हुआ।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा शामिल थे, ने हाई कोर्ट के निष्कर्षों से कड़ा असहमति जताई।

पीड़िता की उम्र पर: “पीड़िता स्पष्ट रूप से 18 वर्ष से कम थी। मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य से उसकी उम्र 12–15 साल साबित हुई। हाई कोर्ट ने इस पर संदेह करके गलती की।”

एफआईआर में देरी पर: कोर्ट ने कहा कि देरी स्वाभाविक थी, क्योंकि पीड़िता को धमकी दी गई थी और गर्भवती होने के बाद ही सच्चाई सामने आई।

गर्भ और गर्भपात पर: मेडिकल रिपोर्ट और अस्पताल के दस्तावेजों ने गर्भावस्था और गर्भपात की पुष्टि की, जिसे हाई कोर्ट ने नज़रअंदाज़ किया।

प्रक्रियात्मक त्रुटियों पर: “आरोप तय करने या संयुक्त ट्रायल में मात्र अनियमितता से मुकदमा अमान्य नहीं होता, जब तक इससे वास्तविक न्याय की विफलता साबित न हो।”

संदेह के सिद्धांत पर: “छोटी-मोटी विसंगतियों को उचित संदेह का दर्जा नहीं दिया जा सकता। मामूली विरोधाभासों पर बरी करना अपराधियों को कानून से बचने का रास्ता देता है।”

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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सज़ा को बहाल कर दिया और कहा:

“प्रक्रिया न्याय को नियंत्रित करने के लिए नहीं होती। हाई कोर्ट ने कानून का गलत इस्तेमाल किया और अनावश्यक बरी का आदेश दिया। ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था और वही बहाल किया जाता है।”

दोनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया गया। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो ट्रायल कोर्ट को हिरासत में लेने का निर्देश दिया गया।

केस का शीर्षक: सुशील कुमार तिवारी बनाम हरे राम साह एवं अन्य

अपील: आपराधिक अपील (विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक अपील) संख्या 18377/2024 से उत्पन्न)

निर्णय की तिथि: 1 सितंबर, 2025

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