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सुप्रीम कोर्ट ने सुरेश शर्मा हत्या मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का बरी करने का फैसला बरकरार रखा, राज्य की अपीलें खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 2006 सुरेश शर्मा हत्या मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का बरी करने का फैसला बरकरार रखा, कमजोर सबूतों के कारण राज्य की अपील खारिज।

Vivek G.
सुप्रीम कोर्ट ने सुरेश शर्मा हत्या मामले में राजस्थान हाईकोर्ट का बरी करने का फैसला बरकरार रखा, राज्य की अपीलें खारिज

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राजस्थान सरकार द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया, जिससे 2006 में अधिवक्ता सुरेश शर्मा की हत्या के मामले में तीनों आरोपियों की बरी होने की स्थिति बरकरार रही। जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों में गंभीर खामियां थीं-गवाहियों में अविश्वसनीयता, कमजोर जब्ती कार्यवाही और गैर-कानूनी रिकार्ड-ऐसे में हाईकोर्ट के 2011 के फैसले को पलटने का कोई आधार नहीं बनता।

पृष्ठभूमि

मामला जनवरी 2006 का है। जोधपुर के वकील सुरेश शर्मा एक दिन घर से खेती की जमीन देखने निकले लेकिन वापस नहीं लौटे। अगले दिन उनकी लाश दो गांवों के बीच मिली, गला घोंटे जाने और चेहरे को बिगाड़ने के प्रयास के स्पष्ट निशान पाए गए।

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ट्रायल कोर्ट ने परिस्तिथिजन्य साक्ष्यों के आधार पर 2008 में हेमलता, उनके पति नरपत चौधरी और भंवर सिंह को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन 2011 में राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर ने यह सजा रद्द कर दी, यह कहते हुए कि अभियोजन का केस विरोधाभासों और कमजोर साक्ष्यों पर टिका है। राज्य ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

अदालत की टिप्पणियां

सर्वोच्च न्यायालय ने गवाहियों और जब्ती की कार्यवाही की बारीकी से जांच की। एक गवाह ने दावा किया कि शर्मा को हत्या की रात हेमलता के घर के बाहर स्कूटर खड़ा करते देखा था। लेकिन अदालत ने यह तथ्य सामने रखा कि इतनी “महत्वपूर्ण बात” पुलिस को एक महीने बाद ही बताई गई। अदालत ने टिप्पणी की, “गवाह का इतने लंबे समय तक चुप रहना बेहद संदिग्ध है।”

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इसी तरह, हेमलता के घर से बरामद रक्तरंजित चुन्नी को भी न्यायालय ने महत्वहीन माना क्योंकि खून के धब्बों का समूह मृतक के रक्त समूह से मिलान ही नहीं कराया गया। न्यायमूर्तिों ने कॉल डिटेल्स के मामले में भी गंभीर खामियों को रेखांकित किया।

पीठ ने कहा, “कथित आपत्तिजनक कॉल रिकार्ड्स केवल हाथ से लिखे नोट के रूप में पेश किए गए, जबकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-बी के तहत अनिवार्य प्रमाणपत्र प्रस्तुत ही नहीं किया गया।”

अदालत ने यह भी कहा कि साजिश और मकसद की कहानियाँ महज़ अटकलें थीं। जमीन विवाद और व्यक्तिगत तनावों की गवाही कानूनी जांच में टिक नहीं सकीं।

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निर्णय

मामले का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हाईकोर्ट की दलीलों में कोई त्रुटि नहीं है। पीठ ने कहा, “हम दृढ़ता से मानते हैं कि ऐसा कोई ठोस कारण मौजूद नहीं है, जिससे आरोपियों की बरी करने के फैसले को पलटा जाए।”

इस तरह, राज्य की अपीलें खारिज कर दी गईं और सुरेश शर्मा हत्या मामले में आरोपियों की बरी की स्थिति बरकरार रही।

मामला: राजस्थान राज्य बनाम भंवर सिंह एवं अन्य

निर्णय की तिथि: 26 सितंबर 2025

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