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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आदेश VI नियम 17 सीपीसी के तहत तलाक याचिका में संशोधन की अनुमति देने वाले पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा: कोई अवैधता नहीं मिली

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तलाक की याचिका में संशोधन की अनुमति देने वाले फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए फैसला सुनाया कि मुद्दों की रूपरेखा इस तरह के संशोधन पर रोक नहीं लगाती है। - चित्रांशी बनाम राजनारायण त्रिपाठी

Shivam Y.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आदेश VI नियम 17 सीपीसी के तहत तलाक याचिका में संशोधन की अनुमति देने वाले पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा: कोई अवैधता नहीं मिली

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक लंबित तलाक मामले में संशोधन की अनुमति देने वाले फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने कहा कि केवल मुद्दे तय हो जाने भर से मुकदमे की सुनवाई शुरू नहीं मानी जा सकती, इसलिए पति द्वारा मांगा गया संशोधन सही रूप से स्वीकृत था। यह आदेश 22 सितंबर 2025 को चित्रांशी बनाम राजनारायण त्रिपाठी मामले में दिया गया, जो हमीरपुर फैमिली कोर्ट के आदेश से संबंधित था।

पृष्ठभूमि

यह विवाद वर्ष 2020 में तब शुरू हुआ जब राजनारायण त्रिपाठी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की। पत्नी चित्रांशी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए लिखित बयान दाखिल किया। इसके बाद दोनों पक्षों की दलीलें पूरी होने पर जुलाई 2022 में फैमिली कोर्ट ने मुद्दे तय किए।

इसी बीच, पति ने सीपीसी के आदेश VI नियम 17 के तहत याचिका के कुछ पैरा संशोधित करने का आवेदन दिया। संशोधन में पत्नी के एक सहकर्मी से कथित निकटता और उसके "अमर्यादित व्यवहार" का उल्लेख किया गया था, जिसे पति ने विवाह टूटने का कारण बताया।

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पत्नी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह संशोधन मुकदमे की शुरुआत के बाद लाया गया है और इससे पूरी याचिका की प्रकृति बदल जाएगी, जो सीपीसी के अनुसार अस्वीकृत होना चाहिए।

लेकिन 12 दिसंबर 2022 को फैमिली कोर्ट ने संशोधन स्वीकार कर लिया और ₹800 का खर्च लगाया। इसी आदेश के खिलाफ चितरांशी ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अदालत के अवलोकन

न्यायमूर्ति निगम ने सबसे पहले सीपीसी के आदेश VI नियम 17 की व्याख्या की, जो याचिकाओं में संशोधन की प्रक्रिया से संबंधित है। अदालत ने कहा कि यद्यपि किसी भी चरण में संशोधन किया जा सकता है, परंतु ट्रायल शुरू होने के बाद ऐसा तभी संभव है जब यह साबित हो कि पक्षकार उचित सावधानी के बावजूद पहले यह बात नहीं रख सका।

मुख्य प्रश्न था - क्या ट्रायल वास्तव में शुरू हो चुका था?

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मुद्दे तय होना ट्रायल की शुरुआत नहीं है। न्यायमूर्ति ने कहा -

“तकनीकी रूप से मुकदमे की सुनवाई तब शुरू होती है जब साक्ष्य रिकॉर्ड होना प्रारंभ हो, न कि जब मुद्दे तय किए जाएं।”

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उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले मोहिंदर कुमार मेहरा बनाम रूप रानी मेहरा (2018) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे तथ्य जो बाद में सामने आएं, उन्हें न्याय के हित में संशोधन के रूप में शामिल किया जा सकता है।

पीठ ने आगे टिप्पणी की,

“ऐसे कई मामले होते हैं जहाँ पक्षकारों से संबंधित नए तथ्य वाद दायर होने या मुद्दे तय होने के बाद सामने आते हैं। ऐसे में न्याय सुनिश्चित करने के लिए संशोधन की अनुमति देना आवश्यक होता है।”

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि नियम 17 की सीमा केवल उन मामलों पर है जहाँ संशोधन विलंब या प्रक्रिया को टालने के उद्देश्य से किया जाता है।

निर्णय

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति निगम ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि पति द्वारा मांगे गए संशोधन से तलाक याचिका की प्रकृति नहीं बदली, बल्कि यह उन्हीं तथ्यों का विस्तार था जो मुकदमे के दौरान सामने आए।

अदालत ने कहा -

“प्रस्तावित संशोधन ऐसे तथ्यों का विवरण है जो वादी को याचिका लंबित रहने के दौरान ज्ञात हुए। यदि वे सिद्ध हो जाते हैं, तो वे क्रूरता के दायरे में आ सकते हैं।”

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पत्नी की इस दलील को भी अदालत ने अस्वीकार किया कि पति नया आधार जोड़ रहा है। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 में कई आधारों पर तलाक की अनुमति है और यदि कोई नया आधार भी जोड़ा जाए तो वह संशोधन पर रोक नहीं लगाता।

न्यायमूर्ति निगम ने कहा -

“किसी एक आधार पर दिए गए तलाक के निर्णय का प्रभाव अन्य आधारों पर नहीं पड़ता। ऐसे संशोधन से कई मुकदमों की बजाय एक ही कार्यवाही में विवाद का निपटारा हो जाता है।”

अंततः अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट द्वारा किया गया आदेश विधि सम्मत है और उसमें कोई अवैधता नहीं है।

“याचिका निराधार है और इसे खारिज किया जाता है,” न्यायमूर्ति ने कहा।

साथ ही फैमिली कोर्ट हमीरपुर को निर्देश दिया गया कि विवाह याचिका संख्या 291/2020 को कानून के अनुसार शीघ्र निपटाया जाए और दोनों पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का उचित अवसर दिया जाए।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को यह भी याद दिलाया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 21-B वैवाहिक मामलों के शीघ्र निपटारे की बाध्यता तय करती है। अतः न्यायमूर्ति ने अनावश्यक स्थगन से बचने और जल्द सुनवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रक्रिया संबंधी विवाद का पटाक्षेप करते हुए मुख्य तलाक वाद को सुनवाई के लिए आगे बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया।

Case Title: Chitranshi vs. Rajnarayan Tripathi

Case Number: Matters Under Article 227 No. 1261 of 2023

Delivered On: September 22, 2025

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