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राजस्थान उच्च न्यायालय के अनुसार, मजिस्ट्रेट FIR के बिना भी BNSS की धारा 225 के तहत सीमित पुलिस जांच का आदेश दे सकते हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि हर शिकायत पर एफआईआर जरूरी नहीं, मजिस्ट्रेट सीमित जांच का आदेश देकर आगे की कार्यवाही तय कर सकता है। - जोगेंद्र पाल बनाम राजस्थान राज्य और अन्य।

Shivam Y.
राजस्थान उच्च न्यायालय के अनुसार, मजिस्ट्रेट FIR के बिना भी BNSS की धारा 225 के तहत सीमित पुलिस जांच का आदेश दे सकते हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि हर शिकायत पर एफआईआर दर्ज करना जरूरी नहीं होता। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार है कि वह मामले के तथ्यों के आधार पर सीमित जांच या प्रारंभिक पूछताछ का रास्ता अपनाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला एक आपराधिक शिकायत से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें एफआईआर दर्ज कराने के बजाय मजिस्ट्रेट ने सीमित जांच का निर्देश दिया था।

रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायत प्रस्तुत होने पर मजिस्ट्रेट ने पहले शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया, लेकिन उस समय कोई अतिरिक्त गवाह या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए। इसके बाद अदालत ने पुलिस को केवल सीमित उद्देश्य के लिए जांच करने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा।

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इस आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

जस्टिस फरजंद अली ने सुनवाई के दौरान कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत मजिस्ट्रेट को स्पष्ट विवेकाधीन शक्ति दी गई है।

अदालत ने कहा,

“मजिस्ट्रेट यह तय कर सकता है कि वह सीधे एफआईआर का निर्देश दे या पहले सीमित जांच के माध्यम से यह देखे कि आगे कार्यवाही के पर्याप्त आधार हैं या नहीं।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 225 BNSS के तहत होने वाली जांच, सामान्य पुलिस जांच (एफआईआर के बाद) से अलग होती है। यह केवल प्रारंभिक स्तर पर अदालत की सहायता के लिए होती है और इसमें गिरफ्तारी या चार्जशीट जैसे कठोर कदम शामिल नहीं होते।

“यह जांच केवल यह तय करने के लिए होती है कि मामला आगे बढ़ाने योग्य है या नहीं,” अदालत ने कहा।

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हाईकोर्ट ने विस्तार से समझाया कि शिकायत के मामलों में दो अलग-अलग रास्ते होते हैं0-
एक, जहां पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज कर पूरी जांच की जाती है;
दूसरा, जहां मजिस्ट्रेट स्वयं या सीमित जांच के जरिए यह तय करता है कि मामला आगे बढ़े या नहीं।

अदालत ने माना कि मजिस्ट्रेट ने पहले शिकायतकर्ता का बयान दर्ज कर कानून का पालन किया और फिर सीमित जांच का आदेश देकर उचित प्रक्रिया अपनाई।

अदालत ने पाया कि निचली अदालत के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने जैसी स्थिति नहीं है।

कोर्ट ने कहा,

“यह आवश्यक नहीं है कि हर शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। यह पूरी तरह मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर करता है।”

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा।

Case Details

Case Title: Jogendra Pal vs State of Rajasthan & Anr.

Case Number: S.B. Criminal Misc. Petition No. 4503/2025

Judge: Justice Farjand Ali

Decision Date: 06 April 2026

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