दिल्ली हाईकोर्ट ने एक गंभीर पॉक्सो मामले में दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखते हुए आरोपी की अपील खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि पीड़ित बच्चे की गवाही न होना अपने आप में अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं बनाता, खासकर तब जब रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल और परिस्थितिजन्य साक्ष्य घटना की पुष्टि करते हों।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला वर्ष 2017 का है। अभियोजन के अनुसार, दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर इलाके में रहने वाला लगभग 6-7 साल का दिव्यांग बच्चा घर में अकेला था। उसकी मां काम पर गई हुई थी। आरोप था कि आरोपी ने बच्चे की शारीरिक और मानसिक स्थिति का फायदा उठाते हुए उसके साथ अप्राकृतिक यौन कृत्य किया। बाद में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 377 और POCSO Act की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से कहा गया कि पीड़ित बच्चे को अदालत में गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया, जिससे बचाव पक्ष को गंभीर नुकसान हुआ। यह भी दलील दी गई कि मेडिकल रिकॉर्ड में बच्चे की बोलने की अक्षमता स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं थी और अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि बच्चा इशारों या किसी अन्य माध्यम से संवाद करने में पूरी तरह असमर्थ था।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि FSL रिपोर्ट में किसी जैविक द्रव्य या डीएनए का पता नहीं चला और किसी प्रत्यक्षदर्शी ने कथित यौन हमला होते नहीं देखा।
मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद गवाहों और मेडिकल साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि बच्चा गंभीर रूप से दिव्यांग था और सामान्य तरीके से अपनी बात व्यक्त करने में सक्षम नहीं था।
अदालत ने कहा,
“पीड़ित के पिता, मां और डॉक्टर की गवाही से यह स्थापित होता है कि बच्चा बोल नहीं सकता था और उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वह सामान्य रूप से संवाद कर सके।”
कोर्ट ने यह भी माना कि घटना के समय आरोपी बंद कमरे के भीतर बच्चे के साथ अकेला मौजूद था और मेडिकल जांच में बच्चे के शरीर पर ताजा चोटें मिली थीं।
फैसले में कहा गया,
“यह सही है कि किसी गवाह ने आरोपी को यौन हमला करते हुए नहीं देखा, लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्य और मेडिकल रिपोर्ट अभियोजन के मामले की पुष्टि करते हैं।”
हाईकोर्ट ने आरोपी की उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें मेडिकल रिपोर्ट की वैधता पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने कहा कि जिन डॉक्टरों ने मेडिकल रिपोर्ट तैयार की थी, वे अब अस्पताल की सेवा में नहीं थे, लेकिन रिपोर्ट को कानूनन स्वीकार्य तरीके से साबित किया गया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन अपराध साबित करने के लिए वीर्य या डीएनए मिलना जरूरी नहीं होता।
अदालत ने कहा,
“Penetration to any extent is sufficient.” यानी प्रवेश की थोड़ी मात्रा भी अपराध सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और अभियोजन ने आरोपों को संदेह से परे साबित किया है। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और सजा को बरकरार रखा।
Case Details
Case Title: Nabi Hasan vs The State (Govt. of NCT Delhi) & Anr.
Case Number: CRL.A. 189/2025
Judge: Justice Chandrasekharan Sudha
Decision Date: May 16, 2026











